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रविवार, 17 दिसंबर, 2006 को 16:23 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

ज़्यादातर प्रस्ताव आईटी क्षेत्र के लिए

उत्तर प्रदेश में विशेष आर्थिक ज़ोन (एसईजेड) बनाने के लिए कुल तीन दर्ज़न से अधिक प्रस्ताव आए हैं, लेकिन अभी तक सात को भारत सरकार से औपचारिक स्वीकृति मिली है.

इनमें से एक मोज़र बेयर लिमिटेड द्वारा नोएडा में प्रस्तावित वैकल्पिक ऊर्जा की परियोजना है. शेष सभी छह सूचना तकनीक यानी आईटी के क्षेत्र में हैं.

उत्तर प्रदेश में एसईजेड बनने में अब तक जो प्रगति हुई है उसमें ख़ास बात ये है कि ज़्यादातर प्रस्ताव नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लिए आए हैं जो दिल्ली से सटे हुए हैं और वहाँ उद्योग के लिए आधारभूत ढाँचा आसानी से उपलब्ध है.

नोएडा और ग्रेटर नोएडा चूँकि औद्योगिक विकास के लिए बनाए गए हैं, इसलिए यहाँ पर ज़मीन बिना ख़ास झंझट के उपलब्ध होने की संभावना है.

ज़मीन है मुद्दा

उद्योग विभाग के अधिकारियों के मुताबिक एसईजेड के जो डेढ़ दर्जन प्रस्ताव स्वीकृति के इंतज़ार में हैं, उनमें ज़मीन की उपलब्धता न होना ही मुख्य मुद्दा है.

ज़मीन आसानी से उपलब्ध होने की उम्मीद में अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस समूह ने नोएडा में 2500 एकड़ में एक मल्टीप्रोडक्ट एसईजेड बनाने का प्रस्ताव किया है.

अधिकारियों के अनुसार नोएडा और रिलायंस के बीच इस प्रस्ताव पर सहमति बन चुकी है, अब बाकी औपचारिकताओं के लिए प्रस्ताव राज्य सरकार और फिर केंद्र को भेजा जाएगा.

छानबीन के दौरान यह भी मालूम हुआ कि रिलायंस उद्योग समूह ने दादरी की अपनी परियोजना को भी मल्टीप्रोडक्ट एसईजेड का स्वरूप देने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन यह प्रस्ताव अभी सरकार के पास विचाराधीन है.

दादरी परियोजना में प्रारंभिक तौर पर केवल गैस आधारित बिजलीघर लगाने की बात थी, पर समझा जाता है कि 2500 एकड़ ज़मीन मिलने की आशा में यहाँ भी एसईजेड बनाने का प्रस्ताव आया है.

आंदोलन

दादरी परियोजना में गैस की उपलब्धता तो एक मुद्दा है ही, उससे बड़ा मुद्दा यह है कि वहाँ पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह किसानों के एक समूह के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं.

इन किसानों को पर्याप्त मुआवजा न मिलने की शिकायत है. सरकार का कहना है कि मुआवज़े की राशि किसानों से बातचीत के आधार पर तत्कालीन बाज़ार दर के अनुसार तय की गई थी और किसान चाहें तो अदालत का दरवाज़ा भी खटखटा सकते हैं.

रिलायंस की दादरी परियोजना के बारे में काँग्रेस व अन्य विपक्षी दलों की यह भी शिकायत है कि मुलायम सरकार सरकारी खज़ाने से तमाम रियायतें दे रही है.

वहीं मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का तर्क है कि दादरी बिजली परियोजना से उत्तर प्रदेश का बिजली संकट दूर होगा.

बहरहाल दादरी को छोड़कर उत्तरप्रदेश में सरकार को एसईजेड के मुद्दे पर और कहीं भी राजनीतिक विरोध या आंदोलन नहीं झेलना पड़ रहा है.

अधिकारियों का कहना है कि चूँकि उत्तर प्रदेश में अधिकाँश एसईजेड या तो नोएडा और ग्रेटर नोएडा में आ रहे हैं या फिर उन इलाकों में जहाँ उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम ने पहले ही औद्योगीकरण के लिए आधारभूत ढाँचा तैयार कर रखा है. इसलिए यहाँ हरियाणा या पश्चिम बंगाल जैसी स्थिति नहीं आएगी.

ईपीजेड

2005 में एसईजेड क़ानून बनने से पहले ही उत्तरप्रदेश में निर्यात प्रोत्साहन के लिए ईपीजेड कार्य कर रहे थे.

इनमें से एक ईपीजेड नोएडा में भारत सरकार द्वारा संचालित है.

उद्योग बंधु उत्तर प्रदेश के अधिशासी निदेशक नरेंद्र भूषण का कहना है कि पहले से प्रस्तावित एसईजेड में मुरादाबाद का पीतल उद्योग एसईजेड सबसे सफल रहा है. जहाँ भूखंडों का आवंटन पूरा हो गया है और भारत सरकार ने इसे अपने हाथ में ले लिया है.

इससे उत्साहित होकर मुरादाबाद में ही पीतल उद्योग के लिए एक और एसईजेड बनाने का प्रस्ताव है.

पूर्वांचल के भदोही में वस्त्र उद्योग के लिए एसईजेड प्रस्तावित है जो सरकारी उपक्रम यूपीएसआईडीसी द्वारा विकसित किया जाएगा.

इनके अलावा कानपुर में चमड़ा उद्योग के लिए भी पहले ही एसईजेड प्रस्तावित है.

कर छूट

केंद्रीय अधिनियम में राज्य सरकार पर मुख्य रूप से व्यापार और स्थानीय करों से छूट देने की ज़िम्मेदारी डाली गई है.

उद्योग विभाग के प्रमुख सचिव रवींद्र सिंह का कहना है कि इनके लिए ज़रूरी शासनादेश छह महीने पहले जारी हो गए हैं.

उत्तरप्रदेश सरकार ने पिछले अगस्त महीने में जो एसईजेड नीति घोषित की है. जिसमें इन क़ानूनों के संबंध में श्रमायुक्त के अधिकार एसईजेड के अधिकारियों को देने की बात कही गई है.

उद्योग बंधु के अधिशासी निदेशक नरेंद्र भूषण का तो कहना है कि उत्तरप्रदेश की एसईजेड नीति न केवल सबसे पहले आई बल्कि अन्य राज्यों से बेहतर भी है.

उत्तर प्रदेश सरकार की यह भी कोशिश है कि गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) में प्रस्तावित टेक्सटाइल पार्क जल्द मूर्त रूप ले ले. इसके लिए ज़मीन आवंटित हो चुकी है और भारत सरकार आर्थिक सहायता दे रही है.

राज्य में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए मुलायम सरकार लखनऊ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (लीडा) बनाने जा रही है.

इस परियोजना में लखनऊ और कानपुर के बीच एक बड़ा औद्योगिक शहर बनाना प्रस्तावित है, लेकिन यहाँ ज़मीन का अधिग्रहण एक बड़ा मुद्दा हो सकता है.

हाइटेक टाउनशिप

इनके अलावा राज्य सरकार का आवास एवं शहरी नियोजन विभाग 7365 एकड़ क्षेत्रफल में हाईटेक टाउनशिप निजी क्षेत्र में स्वीकृत कर रहा है.

ये हाइटेक टाउनशिप लखनऊ, बनारस, मथुरा और गाज़ियाबाद में विकसित होंगे. इन सभी में भूमि का अधिग्रहण होगा.

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की उत्तरप्रदेश की प्रभारी पुनीता प्रियदर्शनी का कहना है कि उत्तरप्रदेश में पूँजी निवेश चाहिए और सरकार इसके लिए अनेक सहूलियतें देने को तैयार है.
उनका कहना है कि ज़मीन की उपलब्धता, करों से राहत और श्रम तथा पर्यावरण क़ानूनों में रियायत या बदलाव से नए उद्योगों को लाभ होगा.

लेकिन देखा यह जा रहा है कि यह लाभ नोएडा जैसे विकसित शहरों की तरफ ज़्यादा जा रहा है और रोज़गार की संभावनाएँ भी मुख्यतः तकनीकी रूप से दक्ष लोगों के लिए हैं.