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रविवार, 17 दिसंबर, 2006 को 16:12 GMT तक के समाचार

आलोक पुराणिक
आर्थिक विश्लेषक

असमानता बढ़ाने वाला है एसईजेड

यह भारत में ही संभव है कि कालोनी बनाने वाले प्रोपर्टी डीलर डेवलपर एक झटके में विशेष आर्थिक ज़ोन (एसईजेड) के निर्माता हो जाएँ और एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों की तादाद में एसईजेड कागज़ों पर खड़े हो जाएँ.

अक्तूबर, 2006 के आँकड़ों के हिसाब से देश में 403 एसईजेड या तो औपचारिक तौर पर स्वीकृत हो चुके हैं या फिर उन्हे सिद्धांत रूप में स्वीकृति मिल चुकी है.

अगर सिद्धांतों की बात की जाए तो एसईजेड का उद्देश्य मूलत: निर्यात को बढ़ावा देना है. जिस तरह से प्रोपर्टी डेवलपर एसईजेड पर कूदे हैं, उसे देखकर लगता है कि निर्यात बढ़े या नहीं, प्रोपर्टी के रेट बहुत तेज़ी से बढ़ जाएँगे.

भारतीय रिजर्व बैंक भी इस आशय की चिंता जाहिर कर चुका है. प्रोपर्टी डेवलपरों की दिलचस्पी का अंदाज़ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रोपर्टी के धंधे वाली कंपनियों के प्रिय राज्य हरियाणा में 46 एसईजेड स्वीकृत हो चुके हैं.

असमानता

कुल स्वीकृत एसईजेड के दस प्रतिशत उस राज्य में स्वीकृत हुए हैं, जहां दूर-दूर तक कोई बंदरगाह नहीं है. बंदरगाहों का रिश्ता एसईजेड से यूँ बनता है कि साजो-सामान की ढुलाई अधिकतर वायु मार्ग से नहीं समुद्र मार्ग से होती है.

इसलिए समुद्रतटीय राज्यों में एसईजेड के मामले ज़्यादा भाग्य़शाली साबित होंगे. यह अनायास नहीं है कि कुल स्वीकृत एसईजेड के क़रीब 25 प्रतिशत सिर्फ दो समुद्रतटीय दक्षिण के राज्यों में हैं. आंध्र प्रदेश में 54 और कर्नाटक में 46.

इनके अलावा महाराष्ट्र में 75 और गुजरात के लिए 30 प्रस्ताव हैं.पूरी तस्वीर कुछ इस तरह से बनती है कि कुल स्वीकृत एसईजेड में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात इन्हीं चार राज्यों का हिस्सा 50 प्रतिशत से ज़्यादा है.

उत्तर प्रदेश के खाते में सिर्फ 18, मध्यप्रदेश के खाते में सिर्फ 10, राजस्थान के खाते में सिर्फ 11 एसईजेड आए हैं.

बिहार को विकास की सबसे ज़्यादा ज़रुरत है, पर वहां पर एक भी एसईजेड प्रस्तावित नहीं है.

कर्नाटक इस पूरी स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण राज्य के रुप में उभर कर आएगा. अभी ही राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद का करीब तीन प्रतिशत कर्नाटक के सिर्फ एक शहर बैंगलोर से आता है, इन्फ़ोसिस समेत तमाम सॉफ्टवेयर निर्यातकों की बदौलत. नए एसईजेड के चलते यहां नया निवेश आएगा.

उत्तर भारत का पिछड़ना

परंपरागत तौर पर ही उत्तर भारत औद्योगिक विकास के नक़्शे में बहुत पीछे चल रहा है. ऐसे में एसईजेड के मामले में पिछड़ना उत्तर भारत को और पीछे धकेलेगा. राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के अध्ययन के हिसाब से कानून-व्यवस्था के मामले में पंद्रह राज्यों में बिहार का नंबर सातवाँ था और उत्तर प्रदेश उसके भी पीछे था नौवें नंबर पर. कर्नाटक का नंबर पहला था, बैंगलोर की स्थिति इसे स्पष्ट करती है.

दरअसल क्षेत्रीय विकास के नज़रिए का भी एसईजेड के विकास में ध्यान रखा जाना चाहिए. उत्तर भारतीय राज्यों के पास बंदरगाह नहीं हैं, इसमें वे कुछ नहीं कर सकते, पर सॉफ्टवेयर निर्यात के लिए बंदरगाह की ज़रुरत नहीं पड़ती. इसका कारोबार कंप्यूटर और इंटरनेट लाइनों के ज़रिये ही संभव है.

इसलिए बेहतर यह हो कि सॉफ्टवेयर से जुड़ी फर्मों का झुकाव उत्तर भारत की तरफ हो और मैनुफैक्चरिंग इकाइयाँ दक्षिण में या गुजरात में या महाराष्ट्र में जाएँ.

बिहार और उत्तरप्रदेश में सॉफ्टवेयर के महत्वपूर्ण एसईजेड केंद्र क्यों नहीं बन सकते. क्या जनसंख्या के हिसाब से बड़े इन राज्यों के विकसित हुए बगैर ही भारतीय अर्थव्यवस्था को विकसित माना जा सकता है?

ये सवाल क्षेत्रीय विकास से जुड़े हुए ज़रुरी सवाल हैं. पर दुखद यह है कि इन सवालों का जवाब तलाशने की फुरसत किसी के पास नहीं है, ना नीति निर्माताओं के पास, ना नेताओं के पास और प्रोपर्टी का धंधा करने वालों के पास तो होने का सवाल ही नहीं है.