गुरुवार, 07 दिसंबर, 2006 को 11:11 GMT तक के समाचार
अमिताभ सिन्हा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
इस महीने की शरूआत से भारत की कुछ निजी एअरलाइन कंपनियों ने अपने टिकटों में 150 रुपए का एक अतिरिक्त शुल्क लगा दिया और इसे नाम दिया ‘कंजेशन सरचार्ज का’ यानी भीड़ के कारण शुल्क.
इन कंपनियों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में हवाई यातायात में तेज़ वृद्धि के कारण जहाजो को हवाई अड्डों पर उतरने के लिए काफ़ी देर तक इंतज़ार करना पड़ता है जिससे इंधन की बर्बादी होती है और उन्हे लाखों का नुकसान उठाना पड़ता है.
यह शुल्क लगाने वाली कंपनियों में सहारा, जेट और किंगफिशर एयरलाइंस शामिल हैं.
इस शुल्क ने एक विवाद का रूप ले लिया है. नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने इन कंपनियों से इस शुल्क को हटाने की अपील की लेकिन एयरलाइन कंपनियों ने ये साफ़ कर दिया है कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है.
पटेल का कहना है कि भीड़ सिर्फ दिल्ली, मुंबई और कुछ बड़े हवाई अड्डों पर ही होती है, इसलिए इस शुल्क को सभी यात्रियों पर लगाना उचित नहीं है.
कंपनियों का तर्क
लेकिन जेट एअरवेज के कार्यकारी निदेशक सरोज दत्ता की माने तो ये सच नहीं है. वो कहते हैं, “आज भारत में एक बड़ी ही अजीब स्थिति है. क़रीब हर उड़ान में देरी होती है. बात सिर्फ दिल्ली या मुंबई की नहीं है. इन जगहों के कारण दूसरी उड़ानें भी प्रभावित होती हैं.”
उन्होंने कहा कि ये शुल्क यात्रियों पर एक अतिरिक्त बोझ तो है लेकिन विमान कंपनियों की भी मजबूरी है. वो कहते हैं, “अगर एअरलाइन कंपनियाँ मुनाफ़ा न कमाएँ तो कुछ दिनों में तो बंद ही हो जाएंगी. यात्रियों के लिए ये भी तो अच्छा नहीं होगा.”
किंगफिशर एअरलाइंस में कॉर्पोरेट मामलों की सीनियर मैनेजर रितु बरारिया कहती हैं कि सिर्फ़ कुछ सेंकेडो का इंतज़ार क़रीब लाखों का तेल बर्बाद करता हैं, ऐसी स्थिति में एयरलाइन कंपनियों के पास इस शुल्क को लगाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.
नया प्रयोग नहीं
वैसे ‘कंजेशन फ़ी’ कोई नई बात नही है. लंदन के कुछ इलाक़ों में अग़र आप अपनी कार ले जाना चाहें तो आपको इसी तरह का एक शुल्क देना पड़ता है लेकिन विमान कंपनियों ने इस तरीक़े का शुल्क शायद पहली बार लगाया गया है.
सेंटर फॉर एशिया पैसिफिक एविएशन के कपिल कॉल कहते हैं कि सारा विवाद इसके नाम को लेकर है. उनका कहना है, “सरकार का मन है कि एक अतिरिक्त शुल्क के बजाए एयरलाइन कंपनियाँ अपने किराए में वृद्धि कर लें. लेकिन ये कंपनियाँ चाहती हैं कि यात्रियों को पता चले कि वो जो अधिक पैसे दे रहे हैं वो किस लिए है.”
वे कहते हैं “एक अलग शुल्क दिखाने से यात्रियों को ये संतोष भी होता है कि यह एक अस्थाई चीज़ है और शायद कुछ दिनों में ख़त्म हो जाए.”
सवाल ये भी है कि क्या यात्रियों पर बोझ डालने के अलावा क्या कोई और विकल्प खोजा जा सकता था? जेट के सरोज दत्ता कहते हैं, “हालाँकि हवाई अड्डों पर बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है, लेकिन सरकार से तो हम शुल्क नहीं ले सकते न. अब सरकार खुद ही जब तेल पर अतिरिक्त शुल्क लगाती है तब भी तो आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है.”