बुधवार, 06 दिसंबर, 2006 को 07:17 GMT तक के समाचार
अमिताभ सिन्हा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
इस वर्ष के नोबल शांति पुरस्कार ने कई लोगों को एक नए शब्द से परिचित कराया,' माइक्रोफाइनेंस'.
बांग्लादेश में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लाखों लोगों को आसान शर्तों पर कर्ज़ उपलब्ध करवा कर उनकी ज़िदगियों में एक बड़ा सुधार लाने के एवज़ में मोहम्मद यूनुस और उनके ग्रामीण बैंक को विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार से नवाज़ा गया.
तब कई लोगों नें ये भी जाना कि इस प्रकार के कई प्रयोग भारत के भी कुछ राज्यों में कई वर्षों से चल रहे थे. दक्षिण भारत के प्रांतों में तो माइक्रोफाइनेंस की एक लहर सी चल पड़ी है जिसने लाखों लोगों के जीवन स्तर में आश्चर्यजनक परिवर्तन मुमकिन कर दिया है.
लेकिन देश के अधिकांश इलाक़ों खासकर हिन्दी-भाषी राज्यों और पूर्वोत्तर प्रांतों के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी लोगों को पैसे की किसी भी ज़रूरत के लिए स्थानीय साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. माइक्रोफाइनेंस का चलन इन क्षेत्रों में अभी आम नहीं हो पाया है.
एक बड़ी माइक्रोफाइनेंस कम्पनी, बेसिक्स के अध्यक्ष विजय महाजन कहते हैं कि ये आश्चर्य की बात नहीं कि ये चलन उन जगहों में ज़्यादा पनपा है जहाँ कि स्थितियाँ पहले से ही अनुकूल थीं.
वो कहते हैं, “दक्षिण भारत में लोगों में ऋण लेने और देने की क्षमता ज्यादा है क्योंकि आर्थिक स्थिति पिछले कई सालों से काफी अच्छी रही है. यहां के लोगों में ऋण वापस करने की चाह भी ज्यादा है.जबकि उत्तर और पूर्वी भारत में कर्ज़ वापसी की प्रवृत्ति थोड़ी कम देखी गई है."
ज़रूरत
माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की छोटी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करती हैं.
गावों में मज़दूरों और किसानों को आम तौर पर कम रक़म की ज़रूरत होती है जिसे परंपरागत बैंक देने से कतराते हैं. फिर ये लोग कागज़ी कारवाई और गारंटी की ज़रूरत पूरी करने में भी अक़्सर असमर्थ होते हैं जिसका नतीजा होता है कि इन लोगों को स्थानीय महाजनों की शरण में जाना पड़ता है जिनकी ब्याज़ दरें आसमान छूती हैं.
माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ न तो किसी प्रकार के कागज़ माँगती हैं ना ही कोई ज़मानत और सबसे बड़ी बात ये कि ये ख़ुद गांवों में जाकर ऋण देती हैं.
ये कंपनियाँ ख़ुद बैकों से कर्ज़ लेती हैं और फिर थोड़ी ज़्यादा ब्याज दर पर ज़रूरतमंदों को देती हैं जो कि महाजनों के दरों से फिर भी कम होती है.
इस व्यवसाय की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि इसमें वसूली की दर क़रीब 98-99 प्रतिशत है.
लगभग सभी बड़ी कंपनियों की तरह बेसिक्स का मुख्य कारोबार भी दक्षिण भारत में ही है. हालाँकि यह उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में भी काम करती है.
दिक्कत
बेसिक्स के विजय महाजन कहते हैं कि बिहार और झारखंड में भी उनकी कंपनी की ऋण वसूली दर उतना ही है जितना कि दक्षिणी प्रांतो में पर इन राज्यों में काम करने में कुछ दिक्कतें तो हैं ही.
वो कहते हैं, “जो ग़रीब लोग हैं उनकी तरफ़ से वापसी में कोई समस्या नहीं है लेकिन क़ानून व्यवस्था या आम सुविधाओं की दिक्कत थोड़ी ज्यादा है. सड़कें अच्छी नहीं हैं, बैंकिंग सिस्टम इतना अच्छा नहीं है, दूरसंचार सुविधा ठीक नहीं है. शाम के समय में आने जाने में परेशानी होती है. कई जगहों में नगद ले जाने में ख़तरा है."
इलाहाबाद मे सोनाटा फाइनेंस के अनूप कुमार राजनीतिक हस्तक्षेप को भी इस सूची में जोड़ते हैं लेकिन पटना में कई सालों से एक छोटे स्तर पर इस तरह की एक संस्था चला रहे सुनील कुमार चौधरी कहते है कि पिछड़े राज्य एक हद तक अपनी इमेज के भी शिकार हैं.
वो कहते हैं, “बिहार के नाम पर क्रेडिट संस्थाओं का विश्वाश पूरी तरह नहीं बन पाया है. उनको लगता है कि पता नहीं उनके पैसे वापस होंगे या नहीं होंगे."
हालाँकि सभी का मानना है कि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. बेसिक्स के विजय महाजन आँकड़ों से भी ये साबित करने की कोशिश करते हैं.
उनका कहना है, “ये पहला वर्ष है जब बैंको के कुल ऋण में दक्षिण भारत के चार राज्यों का हिस्सा 70 प्रतिशत से कम है. पहले ये 75 से 80 प्रतिशत होता था. मेरा ख्याल है कि अगले तीन-चार सालों मे इन राज्यों में भी माइक्रोफाइनेंस काफी फैलेगा."