शुक्रवार, 20 अक्तूबर, 2006 को 04:33 GMT तक के समाचार
टाटा समूह ने एंग्लो-डच इस्पात कंपनी कोरस को नौ अरब डॉलर में ख़रीद लिया है.
इस सौदे के बाद टाटा दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी बन गई है, कोरस का नाम नहीं बदला जाएगा लेकिन अब उसका स्वामित्व बदल गया है.
यह भारत के कार्पोरेट इतिहास में एक मील का पत्थर है, किसी भी भारतीय कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा सौदा पहले नहीं किया था.
टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने इसे एक 'रोमांचक क्षण' बताया है.
टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक बी मुथुरमन ने कहा कि इस सौदे के बाद कोरस से कर्मचारियों की छँटनी नहीं होगी.
उत्साह
रतन टाटा ने कहा, "कोरस को ख़रीदना हमारी विस्तार योजना के अनुरूप है जिसके तहत हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं."
उन्होंने कहा, "टाटा स्टील और कोरस दोनों ही बहुत लंबे और गौरवपूर्ण इतिहास वाली कंपनियाँ हैं, साथ मिलकर हम तेज़ी से बदलते इस्पात उद्योग में अपनी मज़बूत पकड़ बनाए रखने में कामयाब होंगे."
कोरस के चेयरमैन जिम लेंग भी इस सौदे से काफ़ी ख़ुश हैं, उन्होंने कहा, "यह हमारे लिए सही समय पर सही कंपनी के साथ, सही क़ीमत पर हुआ सौदा है जिसकी शर्तें भी ठीक हैं."
अभी ज़्यादा समय नहीं बीता जब लक्ष्मीनिवास मित्तल ने आर्सेलर को ख़रीदकर दुनिया की सबसे बड़ी इस्पात कंपनी खड़ी कर दी थी.
इस तरह दुनिया की सबसे बड़ी और पाँचवी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी भारतीय उद्यमियों के हाथों में आ गई है.
टाटा समूह ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय सौदे किए हैं जिनमें चाय कंपनी टेटली का अधिग्रहण शामिल है.
कोरस 1999 में बनी थी जब ब्रिटिश स्टील और नीदरलैंड की हूगोवेन्स समूह के बीच साझीदारी हुई थी.
लगभग साढ़े 47 हज़ार लोग कोरस के लिए दुनिया भर में काम कर रहे हैं जिनमें से 24 हज़ार सिर्फ़ ब्रिटेन में हैं.
वर्ष 2005 में टाटा स्टील उत्पादन के लिहाज से दुनिया में 56 वें नंबर की कंपनी थी लेकिन कोरस को ख़रीदने के बाद यह पाँचवी सबसे बड़ी कंपनी हो गई है.
विश्लेषकों ने मोटे तौर पर सौदे का स्वागत किया है लेकिन उन्होंने कुछ जोखिम भी गिनाए गए हैं.
सबसे बड़ा ख़तरा यह जताया जा रहा है कि आने वाले समय में आर्थिक विकास की गति अगर धीमी रही तो टाटा उस क़र्ज़ को कैसे चुका पाएगी जो उसने कोरस को ख़रीदने के लिए लिया है.