शुक्रवार, 21 जुलाई, 2006 को 09:18 GMT तक के समाचार
एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत अपने यहाँ एचआईवी और एड्स का प्रसार रोकने में नाकाम रहता है तो देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
नेशनल काउंसिल ऑफ़ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस बीमारी पर प्रभावी तरीक़े से रोक नहीं लगी तो आर्थिक विकास की दर में एक फ़ीसदी की गिरावट आ सकती है.
एनसीएईआर सरकारी कोष से गठित संस्था है. संस्था का कहना है कि सरकार को एड्स के रोकथाम कार्यक्रम पर ज़्यादा ख़र्च करना चाहिए.
इस समय 50 लाख से ज़्यादा भारतीय एचआईवी से ग्रस्त हैं और संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में सबसे ज़्यादा एचआईवी से ग्रस्त लोग हैं.
कोशिश
लेकिन भारत में एड्स की रोकथाम के लिए काम करने वाली संस्था नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (नाको) की प्रमुख सुजाता राव का कहना है कि सरकार की कोशिश से इसे कम किया जा सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है, "एड्स का प्रसार न रुका तो देश की आर्थिक प्रगति में 0.86 फ़ीसदी और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 0.55 फ़ीसदी की गिरावट आ सकती है."
रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्माण, रसायन और खनन क्षेत्र के अकुशल श्रमिक एचआईवी से सबसे ज़्यादा संक्रमित होते हैं.
यह भी चेतावनी दी है कि एड्स के कारण भारत में ग़रीबी बढ़ सकती है. लेकिन एड्स के ख़िलाफ़ अभियान से जुड़ी संस्थाओं का कहना है कि प्रभावी तरीक़े से अभियान चलाया गया तो इस ख़तरे से निपटा जा सकता है.
नाको की निदेशक सुजाता राव का कहना है कि एचआईवी से ज़्यादा प्रभावित देशों में संक्रमित लोगों की संख्या पर क़ाबू पाया जा सकता है और भारत सरकार भी इसके लिए व्यापक अभियान चला रही है.