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शनिवार, 01 जुलाई, 2006 को 00:19 GMT तक के समाचार

'डब्ल्यूटीओ में कोई समझौता नहीं होगा'

भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने कहा है कि जिनीवा में हो रही विश्व व्यापार संगठन वार्ता में इस सप्ताहांत मुख्य मुद्दों पर कोई समझौता नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि वे इस वार्ता से जल्दी ही वापस आ रहे हैं क्योंकि उनके वहाँ रहने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.

भारत के वाणिज्य मंत्री ने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा है कि बातचीत का दौर संकट में फँस गया है और इस हफ़्ते जिन प्रमुख मुद्दों पर समझौता होना था, अब वो नहीं हो सकता.

स्विटज़रलैंड के जिनीवा शहर में विश्व व्यापार संगठन की बातचीत चल रही है.

इस बैठक में पचास से ज़्यादा देश कृषि सब्सिडी और अन्य उत्पादों पर शुल्क कम करने के लिए प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे हैं.

विश्व व्यापार संगठन में अमीर और विकासशील देशों के बीच मामला इसलिए फँस गया है क्योंकि अमरीका और यूरोपीय देश चाहते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश उनके माल के लिए अपने बाज़ारों को पूरी तरह खोल दें.

साथ ही वे ये भी चाहते हैं कि विकासशाल देश विदेशी माल के आयात पर लगी पाबंदियाँ दूर कर दें.

लेकिन भारत हमेशा इस मुद्दे पर बराबरी का व्यवहार किए जाने की माँग करता रहा है.

विवाद

अहम मुद्दों पर बात करने के लिए छह देशों के मंत्रियों ने शुक्रवार देर रात जिनीवा में मुलाकात की.

बीबीसी के अर्थशास्त्र मामलों के संवाददाता एंड्रयू वॉकर का कहना है कि बैठक के बाद ज़्यादातर मंत्री कुछ भी कहने से कतराते रहे.

जब पत्रकारों ने यूरोपीय संघ के व्यापार आयुक्त पीटर मेंडलसन से बार-बार सवाल पूछे तो उन्होंने बस इतना कहा कि 'मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं' है.

इससे पहले विश्व व्यापार संगठन के अध्यक्ष पास्कल लैमी ने वाणिज्य मंत्रियों को आगाह किया था कि सब मसलों पर जल्द ही कुछ प्रगति करने की ज़रूरत है.

अब से एक साल बाद व्यापार समझौते पर निर्णय लेने की अमरीकी राष्ट्रपति के अधिकारों की अवधि ख़त्म हो जाएगी और समझौते को अमरीकी कांग्रेस की मंज़ूरी दिलवाना मुश्किल हो जाएगा.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इस बात की आशंका बनी हुई है कि व्यापार समझौतों को समयसीमा के अंदर पूरा नहीं किया जा सकेगा और जिनीवा में सहमति न बन पाने से ये आशंका और बढ़ गई है.

यूरोपीय संघ के सामने कृषि उत्पादों का आयात शुल्क कम करने की चुनौती है तो अमरीका को कृषि पर सब्सिडी कम करनी है.

वहीं भारत और ब्राज़ील जैसे बड़े विकासशील देशों को औद्योगिक उत्पादों पर आयात शुल्क को घटाना है.

विकासशील देशों के पक्षधर लोगों का मानना है कि यदि सहमति उनके देशों के पक्ष में नहीं होती तो यह मान्य नहीं होगी.