बुधवार, 31 मई, 2006 को 08:06 GMT तक के समाचार
विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से जारी बिकवाली के दबाव में हुई चौतरफ़ा मुनाफ़ा वसूली के कारण भारतीय शेयर बाज़ारों में बुधवार को एक और बड़ी गिरावट आई.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स मंगलवार की तुलना में 388 अंकों के नुकसान से 10398.61 अंकों पर बंद हुआ.
इससे पूर्व सुबह के सत्र में यह एक समय यह 600 अंक लुढ़क गया था.
उधर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का पचास शेयरों वाला सूचकांक निफ्टी भी 114 अंकों के नुकसान से यानी 3.59 फ़ीसदी गिर कर 3071.05 अंकों पर बंद हुआ.
मई माह के अंतिम दिन आई गिरावट के साथ ही पूरे माह के दौरान सेंसेक्स 1643.95 अंक निढ़ाल हो चुका है.
बीएसई में कुल 2443 कंपनियों के शेयरों में कामकाज़ हुआ जिनमें से सिर्फ़ 386 के भावों में बढ़त रही और 2016 कंपनियों के शेयर नीचे में बंद हुए जबकि 41 के भाव पूर्व स्तरों पर स्थिर रहे.
सेंसेक्स की 30 कंपनियों में टाटा मोटर्स को छोड़ कर शेष सभी में गिरावट दर्ज की गई.
गिरावट का राज़
वर्ष 2005 में भारी निवेश करने के बाद विदेशी संस्थागत निवेशक अब मोटा मुनाफ़ा कमा कर भारतीय शेयर बाज़ारों से बाहर निकल रहे हैं.
इसके कारण बाज़ार पिछले एक पखवाड़े से बिकवाली के दबाव में है.
भारत के अलावा अन्य एशियाई देशों और लैटिन अमरीका के विकासशील देशों के शेयर बाज़ारों में भी एफआईआई की ओर से बिकवाली हो रही है.
अमरीका के केन्द्रीय बैंक द्वारा मुख्य ब्याज़ दर बढ़ाने से वहां के सरकारी बांडों की ओर एफ़आईआई का आकर्षण बढ़ा है.
सोमवार तक के पिछले 13 कारोबारी दिनों में एफआईआई दो अरब 47 करोड़ डालर की बिकवाली कर चुके हैं.
29 मई को भी विदेशी निवेशकों ने 81 करोड़ 80 लाख रुपए की बिकवाली की.
दूसरी ओर मंगलवार को लंदन मेटल एक्सचेंज में बुनियादी धातुओं की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई जिससे भारतीय शेयर बाज़ारों में सूचीबद्ध धातु कंपनियों के भाव नीचे आ गए.
रुपए पर दबाव
एफआईआई की ओर से हो रही बिकवाली के कारण मुद्रा बाज़ार में डालर की भारी मांग निकलने से रुपया भारी दबाव में टूट कर बुधवार को पिछले 20 हफ्तों के रिकार्ड निचले स्तर के छू गया.
हालांकि दोपहर बाद इसमें हल्की मजबूती आई और एक डालर का मूल्य 46.34 रुपए रिकॉर्ड किया गया.
विदेशी निवेशक घरेलू शेयर बाज़ारों में शेयरों को बेच कर अपना पैसा डालर में लेकर बाहर की ओर रुख करते हैं, इसलिए बैंकों में डालर की कमी हो जाने से रुपए पर दबाव आता है.