गुरुवार, 19 जनवरी, 2006 को 12:34 GMT तक के समाचार
देवसागर सिंह
उड्डयन विशेषज्ञ
जेट एयरवेज़ और सहारा एयरलाइन्स के बीच जो सौदा हुआ है उसे आमतौर पर देखें तो यह सरकारी विमान कंपनियों के लिए घाटे का सौदा है और इन दोनों कंपनियों को ही फ़ायदा होगा.
इसका सीधा कारण यह दिखता है कि सहारा एयरलाइन्स का जेट एयरवेज़ में विलय हो जाने के बाद विमानन क्षेत्र में जेट एयरवेज़ का कब्ज़ा पचास प्रतिशत से अधिक हो जाएगा.
इसका मतलब यह होगा कि जेट एयरवेज़ का विमानन बाज़ार में एकाधिकार हो जाएगा क्योंकि बची हुई पचास प्रतिशत से भी कम जगह पर सरकारी कंपनियों और छोटी निजी कंपनियों को रहना होगा.
नियम क़ायदों का फ़ायदा
साफ़ दिखाई देता है कि सरकारी नियम क़ायदों के चलते निजी कंपनियों को फ़ायदा हुआ और इंडियन एयरलाइन्स (अब इंडियन) और एयर इंडिया जैसी सरकारी कंपनियों को नुक़सान हुआ.
जेट एयरवेज़ ने अपने शुरुआती दिनों में जिस तरह की प्रगति की उसकी वजह उसे मिली हुई छूटें थीं.
अब जेट और सहारा दोनों के पास एयरपोर्ट में पार्किंग से लेकर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों तक सभी की सुविधा है और ऐसे में वे पहले भारत की सरकारी विमानन कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में होंगी.
स्पष्ट है कि आगे आने वाले दिनों ने इंडियन और एयर इंडिया दोनों को बाज़ार में अपनी जगह बचाने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा.
तेज़ी से बढ़ता बाज़ार
भारत का बाज़ार जिस तरह बढ़ रहा है वैसा और किसी देश में विमानन का बाज़ार नहीं बढ़ रहा है. पूरी दुनिया में कहीं भी 25 प्रतिशत की दर से विमानन बाज़ार नहीं फैल रहा है.
इसलिए भारत में एयरलाइन कंपनियों में जो सौदा हुआ है उसे बाक़ी दूसरे देशों में होने वाले सौदों से अलग करके देखना चाहिए क्योंकि भारत का सौदा कंपनियों को मज़बूत करने वाला सौदा है.
जहाँ तक कर्मचारियों का सवाल है तो सौदा करने वाली दोनों कंपनियाँ इस वक़्त भले कुछ भी कह रही हों, लगता है कि सहारा एयरलाइन्स के कर्मचारियों को नुक़सान होने वाला है.
जहाँ तक राजनीतिक समीकरणों का प्रश्न है, इस पर वामपंथी दलों को स्वाभाविक रुप से ऐतराज़ होना चाहिए, हो सकता है कि संसद के भीतर इसकी आवाज़ सुनाई पड़े.