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शनिवार, 05 नवंबर, 2005 को 07:45 GMT तक के समाचार

किसलय
राँची से

कठिन है डगर औद्योगिक विकास की

झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा राज्य में करोड़ों रूपए के पूंजी निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद सोने का मुकुट पहनकर चाँदी की बाँसुरी बजाते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं.

लेकिन ज़मीनी सच्चाइयों को देखते हुए यही लगता है कि चैन की बाँसुरी बजाना उनके लिए आसान नहीं होगा.

यह सच है कि बिहार से अलग होकर राज्य बनने के बाद यह अब तक औद्योगिक निवेश के वादों का सबसे बड़ा दौर है लेकिन औद्योगिक घरानों ने झारखंड पर जो विश्वास जताया है उस पर खरा उतरने के लिए राज्य सरकार को लोहे के चने चबाने होंगे.

पिछले दिनों बोकारो में अपने अभिनंदन समारोह में स्वर्णमुकुट और चांदी की बांसुरी स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री मुंडा ने बीस हज़ार दर्शकों के बीच घोषणा तो कर दी कि 2010 तक झारखंड के सभी हाथों को काम मिल जाएगा.

लेकिन इसके पीछे जिस डेढ़ लाख करोड़ के समझौतों को उन्होंने आधार बताया उसे अमली जामा पहनाने के लिए राज्य में आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ और कार्यसंस्कृति ही सवालों में उलझी है. यही नहीं, उद्योगों के लिए ज़मीन माँगने गए उद्यमियों को ग्रामीण खदेड़ रहे हैं.

सरकार ने मित्तल, टाटा, जिंदल, एस्सार जैसे बड़े औद्योगिक घरानों के साथ समझौते किए हैं जिनमें ज़्यादातर समझौते इस्पात उत्पादन का संयंत्र लगाने के हैं.

मगर इन योजनाओं को कार्यान्वित करने की राज्य सरकार की तैयारी का आलम ये है कि राज्य में लौह अयस्क के भंडार का सही आँकड़ा तक उपलब्ध नहीं है, राज्य के खनन एवं भूतत्व सचिव अरूण कुमार सिंह इतना ही कहते हैं कि "पर्याप्त मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध हैं."

उन्होंने बताया कि आँकड़े एकत्र करने का काम अब शुरू कर दिया गया है.

राज्य के उद्योग सचिव संतोष सत्पथी कहते हैं, "झारखंड आज निर्णायक दौर से गुज़र रहा है, अभी जो कुछ होगा उसी से तय होगा राज्य ऊँची उड़ान भरेगा या डूबेगा."

ग्रामीण विरोध

इस्पात और ऊर्जा प्लांट लगाने के समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले भूषण स्टील के अधिकारी जब प्रस्तावित योजना के लिए ज़मीन का मुआयना करने गए तो उन्हें ग्रामीणों ने बंधक बना लिया, बहुत मुश्किल से उन्हें छुड़ाया जा सका.

जिंदल समूह के प्रतिनिधियों को भी ग्रामीणों की दुत्कार का सामना करना पड़ा जिसके बाद उन्होंने अपनी योजना का कार्यस्थल ही बदल दिया.

झारखंड में दशकों से स्टील प्लांट चलाने वाली टाटा जैसी कंपनी को अपनी अगली योजना के लिए ज़मीन जुटाने में भारी मुश्किलें आ रही हैं.

दरअसल, लौह अयस्क का केंद्र माने जाने वाले कोल्हान इलाक़े में इन दिनों कई छोटे-बड़े आंदोलन चल रहे हैं, दिक्कत ये है कि उद्योगों को इसी इलाक़े में लगभग 50 हज़ार एकड़ ज़मीन की ज़रूरत है.

ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के संस्थापकों में रहे आदिवासी नेता प्रभाकर तिर्की कहते हैं कि औद्योगीकिरण के नाम पर सरकारों ने झारखंड की जनता को छला है और यह विरोध उसी का नतीजा है.

लेकिन इसके जवाब में राज्य के मुख्यमंत्री कहते हैं, "अब तक पुनर्वास की नीति एयरकंडीशंड कमरों में बनती रही. मैं जंगल का आदमी हूं. जंगल में जाकर वहाँ के लोगों के साथ बैठकर नीतियां बनाने में विश्वास करता हूँ."

बहरहाल, इसमें संदेह नहीं कि आज झारखंड दुनिया भर के उद्यमियों का ध्यान खींच रहा है. यही वजह है कि मित्तल का विमान लंदन से उड़कर सीधा राजधानी राँची में लैंड करता है लेकिन सरकार के सामने चुनौती है कि वह इन अवसरों को राज्य के लिए समृद्धि में बदले.