बुधवार, 03 अगस्त, 2005 को 12:50 GMT तक के समाचार
डॉ आलोक पुराणिक
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
मुंबई में इस समय दो किस्म की बरसात हो रही है. एक बरसात से मुंबई की पब्लिक परेशान है.
दूसरे किस्म की बरसात बादलों से नहीं, विदेशी वित्तीय संस्थानों द्वारा की जा रही है, रुपयों की, भारतीय कंपनियों के शेयर खरीदने के लिए.
बाजार में अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदने के लिए जैसे रुपये बरस रहे हैं और शेयर उपलब्ध नहीं हैं. डिमांड सप्लाई के सीधे से फ़ार्मूले के हिसाब से शेयरों की कीमत बढ़ रही है.
शेयरों की बढ़ी हुई कीमत सेंसेक्स के बढ़े हुए स्तर में साफ़ दिखाई दे रही है.
अब शायद बहुत कम लोगों को याद हो कि तीन अगस्त, 2005 को 7843 का स्तर छूने वाला सेन्सेक्स 14 मई, 2004 यानी काले सोमवार को 5070 के आसपास कराह रहा था.
अब से एक साल पहले यानी 2 अगस्त, 2004 को सेन्सेक्स 5203 पर बंद हुआ था.
एक साल में ऐसा क्या हो गया कि सेन्सेक्स 2640 बिंदुओँ की छलांग लगा गया.
सेंसेक्स के हाल और चाल
मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक यानी सेंसेक्स में तेल और गैस कारोबार का वज़न 19.5 प्रतिशत है. इनफोरमेशन टेक्नोलोजी कारोबार का वज़न करीब 14.9 प्रतिशत है.
वित्तीय कारोबार का असर करीब 18.6 प्रतिशत है. तेजी से खत्म होने वाले उपभोक्ता सामान वाले कारोबार यानी तेल, पाउडर, वाशिंग सोप जैसे कारोबारों वाली कंपनियों का वज़न करीब 10.8 प्रतिशत है.
तेल, गैस, इनफोरमेशन टेक्नोलोजी और वित्तीय कारोबार पिछले छह महीनों में चकाचक चमका है.
वह चमक जाहिर है, सेंसेक्स पर दिखनी ही है पर बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है.
एफआईआई निवेश
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भारत का जिक्र अब एक भुखमरी अर्थव्यवस्था में नहीं होता.
यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसमें भविष्य की अपार संभावनाएँ देखी जाने लगी हैं.
अप्रैल, 2005 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था क्रय क्षमता के पैमाने पर विश्व के चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसमें 1990 से 2004 के बीच औसत विकास दर छह प्रतिशत रही है.
ऐसी विकास दर वाली अर्थव्यवस्थाएं विश्व में ज्यादा नहीं हैं. ऐसी सूरत में विदेशी निवेशकों की आंखें भारतीय शेयर बाज़ारों की तरफ और लग रही हैं.
हाल के घटनाक्रम के बाद से भारतीय शेयर बाज़ारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की उपस्थिति ज्यादा मज़बूत हो रही है.
सिंगापुर से हुए एक आर्थिक समझौते के तहत अकेले सिंगापुर से ही करीब पाँच अरब डालर का निवेश भारतीय शेयर बाज़ारों में संभावित है.
जापानी निवेश
भारतीय शेयर बाज़ारों में अब तक आम तौर पर पश्चिमी देशों के विदेशी निवेशक संस्थानों का निवेश आया है.
जापान और सिंगापुर की निगाहें अभी इस ओर नहीं थीं. अब मामला बदल रहा है.
जापानी संस्थागत निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार आकर्षित कर रहे हैं. यह सेंसेक्स के उछाल की एक महत्वपूर्ण वजह है.
जापानी निवेश की खूबी यह होती है कि अमेरिकन निवेश की प्रकृति के विपरीत, यह निवेश ज्यादा दीर्घकालिक होता है.
एक अनुमान के मुताबिक 2004 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 8.5 अरब डालर का निवेश किया था.
जून 2005 तक ही विदेशी संस्थागत निवेशक करीब पांच अरब डालर का निवेश कर चुके हैं.
एक अनुमान के हिसाब से 2005 में निवेश का यह आंकड़ा दस अरब का आंकड़ा पार करेगा.अनुमान है कि जापानी निवेशकों का हिस्सा इसमें करीब चार अरब डालर होगा.
माल कम डिमांड ज्यादा
पर पूरे माहौल से यह नहीं समझना चाहिए कि भारतीय कंपनियां एकाएक बहुत ही उच्चस्तरीय हो गई हैं. दरअसल यह डिमांड और सप्लाई का खेल है.
इसे ऐसे समझा जा सकता है किसी मुहल्ले में अगर बिक्री के लिए उपलब्ध मकानों के लिए अगर दो खरीदार हैं, तो उनकी कीमत ज्यादा नहीं बढ़ेगी.
अगर दो खरीदारों के बजाय बाजार में पचास खरीदार आ जाएंगे, तो मकानों की कीमत बहुत तेजी से बढ़ जाएगी, भले ही मकानों की गुणवत्ता में कोई सकारात्मक बदलाव न भी आया हो.
ऐसा ही कुछ हो रहा है सेंसेक्स में शामिल कंपनियों की कीमतों के साथ. उनके खरीदार सिंगापुर से लेकर जापान तक निकल आए हैं.
इसलिए फ़िलहाल तो मुंबई शेयर बाजार में विदेशी रुपयों की बारिश थमने के आसार नज़र नहीं आते.