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बुधवार, 30 मार्च, 2005 को 04:57 GMT तक के समाचार

वैट आख़िर है क्या?

भारत में वैल्यू ऐडेड टैक्स (वैट) यानी मुल्य संवर्धित कर को लेकर ख़ासा विवाद छिड़ गया है.

यह वैट आख़िर क्या है?

वैट एक क़िस्म का बिक्री कर है जिसे उपभोक्ता व्यय पर उस राज्य की सरकार लेती हैं.

वैट और बिक्री कर में अंतर सिर्फ़ ये है कि इसकी वसूली कई चरणों में होती है.

यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो वैट लागू करने का मतलब है स्थानीय बिक्री कर के संग्रह के तरीके में बदलाव.

वैट की प्रणाली कुछ ऐसी है कि जो उत्पाद किसी राज्य में आयात या उपयोग किए जाते हैं वहाँ का पहला विक्रेता सबसे पहले कर देता है और उसके बाद के विक्रेता उसमें जुड़ने वाली क़ीमत पर कर देते हैं.

अंतरराज्यीय मामलों में किसी ख़रीद पर पहले लगाया गया टैक्स या तो लौटा दिया जाता है या फिर उसे समायोजित कर दिया जाता है. तकनीकी रूप से इसे 'सेट ऑफ' कहा जाता है.

इसके अलावा उत्पादक ख़रीद पर लगने वाले स्थानीय कर के बराबर ही अपने बिक्री कर में 'सेट ऑफ' पा सकते हैं.

समानता

वैट में मौजूदा प्रणाली से कुछ समानताएँ भी हैं.

मौजूदा प्रणाली में एक अंतरराज्यीय विक्रेता को कर की अदायगी के बिना ही ख़रीद की इजाज़त है.

वहीं वैट के तहत उसे स्थानीय कर देने के बाद ही ख़रीद का अधिकार होगा. मगर ख़रीद पर दिया जाने वाला ये कर उसके देय केंद्रीय बिक्री कर में ही पूरी तरह 'सेट ऑफ' हो जाता है.

अगर देय केंद्रीय बिक्री कर पहले ही अदा किए जा चुके स्थानीय कर से ज़्यादा है तो उसे समायोजित कर दिया जाता है.

उत्पादकों का मामला भी कुछ इसी तरह का है. कर अदायगी के बिना ही ख़रीदने के बजाय इस ख़रीददारी पर स्थानीय कर लगाए जाएंगे और अंतिम उत्पादों पर लगने वाले बिक्री कर में इसे समायोजित कर दिया जाएगा.

वर्तमान प्रणाली के तहत कई व्यापारियों को ये समस्या आ रही थी कि उन्हें दोहरे कर की समस्या का सामना करना पड़ रहा था लेकिन वैट उनकी समस्या हल कर देगा.

अंतरराज्यीय ख़रीदारी में लगने वाला समूचा स्थानीय बिक्री कर केंद्रीय कर में समायोजित हो जाएगा यानी कोई दोहरा कर नहीं लगेगा.

वैट प्रणाली के तहत सभी स्थानीय बिक्रियों में वैट देय होगा यानी इस बात में कोई अंतर नहीं रखा गया है कि बिक्री किसी दूसरे डीलर को की गई है या फिर उपभोक्ता को.

बिक्री मूल्य पर लागू कर की दर के बराबर ही वह कर लिया जाएगा.

वर्तमान प्रणाली के तहत जो भी कर वसूला जाएगा वो सीधे विभाग को ही दिया जाएगा.

लेकिन वैट के तहत वह उपभोक्ता से जो भी कर वसूलेगा वह ख़रीद पर पहले ही दे चुके कर को उसमें से वापस ले लेगा और बाक़ी कर विभाग में जमा कर दिया जाएगा.