बुधवार, 16 मार्च, 2005 को 18:08 GMT तक के समाचार
अनीश आहलूवालिया
बीबीसी हिंदी संवाददाता
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना 1944 में अमरीका के ब्रेटन वुड्स शहर में विश्व के नेताओं के एक सम्मेलन के दौरान हुई थी.
ये दोनो संस्थाएँ ब्रेटन वुड्स संस्था के नाम से भी जानी जाती हैं.
द्वितीय महायुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय अर्थ व्यवस्थाओं को दोबारा पटरी पर लाने के उद्देश्य से इन संस्थाओं का गठन किया गया था.
मगर इन दोनो वित्तीय संस्थाओं की भूमिका अलग अलग रही है.
विश्व बैंक की भूमिका
विश्व बैंक ऋण देने वाली एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों की अर्थ व्यवस्थाओं को एक व्यापक विश्व अर्थ व्यवस्था में शामिल करना और विकासशील देशों में ग़रीबी उन्मूलन के प्रयास करना है.
विश्व बैंक नीति सुधार कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए ऋण देता है.
मगर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष केवल नीति सुधार कार्यक्रमों के लिए ही ऋण देता है.
इन दोनो संस्थाओं में एक फ़र्क ये भी है कि विश्व बैंक केवल विकासशील देशों को ऋण देता है जब कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों का
शुरूआत में विश्व बैंक बांध निर्माण और राजमार्गों के निर्माण जैसी विशिष्ट परियोजनाओं के लिए ऋण देता था.
लेकिन अब इसने आर्थिक नीतियों में आम सुधारों के लिए भी ऋण देना शुरु कर दिया है.
नियंत्रण
विश्व बैंक का नियंत्रण इसके 180 से ज़्यादा सदस्य राष्ट्रों के हाथ में है.
सदस्य राष्ट्र विश्व बैंक के शेयर धारक भी होते हैं और इसकी नीतियों संबंधी फ़ैसले भी वही करते हैं.
इन देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले गवर्नरों के बोर्ड ये फ़ैसले करते हैं. विश्व बैंक के तहत पांच संस्थाएं काम करती हैं जिसमें अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक प्रमुख है.
धन के स्रोत
विश्व बैंक विकास कार्यक्रमों के लिए आवश्यक धन दो तरीके से जुटाता है.
इस धन का कुछ हिस्सा धनी देशों के योगदान के तहत आता है. वहीं अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक वित्तीय बाज़ारों में शेयरों के व्यापार और निवेश के ज़रिए भी धन जुटाता है.
दरअस्ल विश्व बैंक द्वारा दिए जाने वाले ऋण का आधे से अधिक हिस्सा इसी तरीके से जुटाया जाता है.
ऋण वितरण
विश्व बैंक ने वर्ष 2001 में 17.3 अरब डॉलर के ऋण मंज़ूर किए. ये रकम 2000 मे दिए गए ऋण से थोड़ा ही ज्यादा है.
2001 में दिए गए ऋणों का सबसे बड़ा हिस्सा यानि 30 प्रतिशत लातिन अमरीका और केरेबियाई क्षेत्र के देशों को मिला.
अफ्रीकी देशों को 20 विश्व बैंक द्वारा दिए गए ऋण का 20 प्रतिशत मिला. इसका ज़्यादातर हिस्सा एड्स की बीमारी के प्रकोप को रोकने के लिए चलाई जा रही परियोजनाओं और गृहयुद्ध के बाद अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने में लगे देशों की सहायता पर खर्च किया जाएगा.
दक्षिण एशियाई देशों को कुल ऋण राशि का 19 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ.
आरोप
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर अक्सर ये आरोप भी लगते हैं कि इनके ऋण शर्तों की ज़ंजीर में बंधे होते है.
वैश्वीकरण का विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि इन दोनों ही संस्थाओं ने धनी देशों के दबाव में आकर वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया है.
कई वैश्वीकरण विरोधी कार्यकर्ता इन वित्तीय संस्थाओं पर आरोप लगाते रहे हैं कि ऋण की एवज में ग़रीब राष्ट्रों को धनी राष्ट्रों के उत्पादों के लिए अपने बाज़ार खोलने पर दबाव डाला जाता है.
उनका कहना है कि आर्थिक सुधार कार्यक्रम के नाम पर वैश्वीकरण के इस रूप का ग़रीब राष्ट्रों की अर्थ व्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है.