सोमवार, 07 फ़रवरी, 2005 को 01:23 GMT तक के समाचार
अरूण अस्थाना
मुंबई से
भारतीय शेयर बाजार की अब विदेशी निवेशकों के मूड और रणनीति पर निर्भरता कम हो सकती है. ग़ैर सरकारी प्रॉविडेंट फंडों को शेयर बाज़ार में निवेश की अनुमति मिलने से ऐसा होने के आसार बने हैं.
इन फंडों को एक अप्रैल से अपना 5 प्रतिशत हिस्सा शेयर बाजार में निवेश करने की अनुमति मनमोहन सिंह सरकार ने दी है.
इसके अलावा, वे म्युचुअल फंड में भी दस फीसदी हिस्सा तक निवेश कर सकते हैं. बाजार में ग़ैर सरकारी प्रॉविडेंट फंड की आने की खबर से ही उत्साह का माहौल है.
जनवरी के आखिरी हफ्ते से शुरु हुआ बीएसई के सेंसेक्स में उछाल इसका सबसे पहला और ताज़ा प्रमाण है. ये उछाल फरवरी के पहले हफ्ते के शुरु में भी बना रहा.
शेयर बाज़ार के जानकार कहते हैं कि इन फंडों का बाजार में आगमन आने वाले सालों में विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
प्रभाव
अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार को काफ़ी प्रभावित करते रहे हैं. केवल पिछले दो साल में ही इन निवेशकों ने 15 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश भारतीय शेयर बाजार में किया है.
मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट ललित मेहता कहते हैं कि "पिछले कुछ सालों में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार में सुनामी लहरों की तरह पैसा लाते और ले जाते रहे हैं. बाजार में उथल पुथल उनके बाएँ हाथ का खेल रहा है, जबकि उनका प्रभाव कम करने के लिए उनके बराबर या आसपास के स्तर का भी स्थानीय निवेश करने वाला कोई नहीं था."
अब इन फंडों के बाज़ार में आने से, आंशिक रूप से ही सही, पर विदेशी निवेशकों के मुकावले के लिए कोई तो होगा.
एक अनुमान के मुताबिक ये फंड बाजार में अगले एक साल में ही 1500 करोड़ रुपए तक लगा सकते हैं. बाजार में देशी और विदेशी निवेशकों के इस संतुलन से आम निवेशक अब ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगा क्योंकि बाजार की उथल-पुथल का सबसे ज्यादा खामियाज़ा इन छोटे निवेशकों को ही भुगतना पड़ता है.
भारत की सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी में इस समय मात्र करीब दो करोड़ लोग ही निवेशक है और घरेलू बचत का अधिकतम ढाई फीसदी हिस्सा ही शेयर बाज़ार में आ पाता है. लेकिन ये छोटी रकम ही छोटे निवेशकों के लिए भारी होती है.
भारतीय शेयर बाज़ार पर निगाह रखने वाले कई जानकार गैर सरकारी प्राविडेंट फंड की आज़ादी के साथ उनकी जवाबदेही तय करना भी बेहद जरुरी मानते हैं.
उनका मानना है कि ऐसे फंडों पर सख्त निगरानी की जरूरत होगी, नहीं तो ये अपने फायदे के लिए बाज़ार का बेजा इस्तेमाल भी कर सकते हैं.