सोमवार, 26 जुलाई, 2004 को 13:13 GMT तक के समाचार
महबूब ख़ान
बीबीसी हिंदी
भारत में निजी क्षेत्र के संकटग्रस्त ग्लोबल ट्रस्ट बैंक के ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स में विलय की घोषणा के साथ ही जमाकर्ताओं में चिंता की लहर दौड़ गई है.
हालाँकि वित्त मंत्री और ख़ुद बैंक ने यह भरोसा दिलाया है कि बैंक में राशि जमा करने वालों को घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनका धन बैंक में बिल्कुल सुरक्षित है.
मगर यह पाबंदी भी लगा दी गई है कि जमाकर्ता 23 अक्तूबर तक सिर्फ़ दस हज़ार रुपए तक की धनराशि निकाल सकते हैं, इसके अलावा बाक़ी लेन-देन भी बंद रहेगा.
इससे बहुत से जमाकर्ताओं में चिंता है क्योंकि घर-परिवार और कारोबार के लिए सिर्फ़ दस हज़ार रुपए की राशि से कुछ काम नहीं चलेगा.
मसलन बहुत से जमाकर्ताओं का सिर्फ़ एक ही बैंक खाता है और वह जीटीबी में है तो उनका कारोबार ठप हो जाएगा.
हालाँकि आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक कहते हैं कि यह अस्थाई मामला है, मगर इतना तो है कि जमाकर्ताओं का धन सुरक्षित है.
जीटीबी के देश भर में क़रीब आठ लाख जमाकर्ता हैं जिनमें से ज़्यादातर आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हैं और उनका क़रीब पचास अरब धन जीटीबी में जमा है.
निगरानी
आर्थिक जानकार कहते हैं कि ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (जीटीबी) के ओरियंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स में विलय से निजी क्षेत्र के बैंकों में आम जमाकर्ता का भरोसा हिला है जो पूरी आर्थिक प्रक्रिया के लिए एक तरह से चिंताजनक कहा जा सकता है.
आलोक पुराणिक का कहना है कि कुछ साल पहले एक संयुक्त संसदीय समिति ने जीटीबी के हिसाब-किताब को क्लीन चिट दी थी लेकिन दो साल बाद ही जीटीबी को यह क़दम उठाना पड़ा है.
पुराणिक कहते हैं कि निजी बैंक अत्याधुनिक सुविधाओं में अपनी सेवाएँ मुहैया कराने का दावा करते हैं लेकिन जीटीबी के उदाहरण से यह चिंता बढ़ी है कि उसमें जमा किया जाने वाला धन सुरक्षित नहीं है.
"इसलिए लोगों का झुकाव सरकारी क्षेत्र के बैंकों की तरफ़ ज़्यादा होगा क्योंकि वहाँ निजी बैंकों के मुक़ाबले भले ही कम सुविधाएँ नज़र आती हों, और लाइन में लगने पर ज़्यादा वक़्त लगता हो, लेकिन उनका धन तो सुरक्षित है."
आर्थिक जानकार कहते हैं कि सरकार को ख़ासतौर से निजी क्षेत्र के बैंकों के बारे में अपने नियमों में सख़्ती लानी होगी और रिज़र्व बैंक भी लचीला रुख़ अपनाना छोड़ दे.
जानकारों के मुताबिक़ इन बैंकों के खातों की जाँच करने वाली कंपनियों पर भी नज़र रखी जाए ताकि किसी तरह की जोड़-तोड़ की गुंजाइश ना रह सके.
आलोक पुराणिक कहते हैं कि संयुक्त संसदीय समिति ने कहा था कि जीटीबी का हिसाब-किताब करने वाली चार्टर्ड अकाउंटेंट कंपनी ने घाटे का कोई अंदाज़ा नहीं दिया जबकि एक साल के अंदर ही उसके विलय की नौबत आ गई.
एक ही खाता
बहुत से ऐसे कारोबारी या घर-परिवार के लोग हैं जिन्होंने जीटीबी के अपने खाते में ही सारा धन रखा है, जो विभिन्न ज़रूरतों के लिए ख़र्च किया जाता है.
मसलन आँध्र प्रदेश के एक ग्राहक कमाल अहमद कहते हैं, "मेरा मिनरल वॉटर का सारा कारोबार जीटीबी के खाते से चलता है. अब मैं अपने भविष्य के लेकर बहुत चिंतित हूँ."
एक अन्य ग्राहक एस प्रसाद का कहना है कि उन्होंने अपने बूढ़े माँ-बाप की देखभाल के लिए मोटी रक़म जीटीबी के खाते में जमा कर रखी है लेकिन अब तो बहुत दिक्कत होगी.
"अगर वे अचानक बीमार पड़ जाते हैं तो मेरे पास उनकी देखभाल के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं बची है. मुझे दूसरों से उधार लेना पड़ेगा. हम चंद घंटों में ही लखपति से भिखारी बन गए हैं."
कुछ ऐसा ही नज़ारा था मुंबई में. 65 वर्षीय विधवा वसंतबेन मेहता ने जीटीबी की उच्च ब्याज दर से आकर्षित होकर अपना सारा धन उसी में जमा कराया था.
वसंतबेन मेहता कहती हैं, "मैं अच्छी ब्याज दर से धोखे में आ गई. लेकिन अब मुझे समझ में आया कि मैंने अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट की बात नहीं मानकर कितना ग़लत क़दम उठाया, उन्होंने मुझे ऐसा नहीं करने की सलाह दी थी."
एक कारोबारी निलेश सेठ के लाखों रुपए जीटीबी में जमा हैं लेकिन वे कुछ ज़्यादा चिंतित नहीं हैं क्योंकि क्योंकि रिज़र्व बैंक इसे नियंत्रित कर रही है.
"लेकिन ऐसे मामलों से निजी बैंकों की छवि ख़राब हो रही है. लोगों को अपना ज़्यादा धन राष्ट्रीयकृत बैंकों के अलावा दूसरे बैंकों में जमा नहीं करना चाहिए."