गुरुवार, 15 जुलाई, 2004 को 12:54 GMT तक के समाचार
सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता, बैंगलोर
भारत के कॉल सेंटरों में एक अलग तरह का चलन सामने आ रहा है. इनकी नौकरियों के इश्तिहारों में 50 साल तक की उम्र के लोगों को नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.
पहले कॉल सेंटरों में कॉलेज से निकले लड़के-लड़कियों को ही नौकरी दी जा रही थी.
लेकिन कुछ समय से इन कॉल सेंटरों को एक अजीब स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.
नौजवान लड़के और लड़कियाँ इन कॉल सेंटरों में आठ हज़ार से दस हज़ार रूपए तक की नौकरी पाते हैं. लेकिन अधिक आमदनी की चाहत में और कई बार लगातार रात की ड्यूटी से परेशान ये युवा कुछ ही महीनों में नौकरी छोड़ देते हैं.
एक 21 वर्षीय युवक जुनैद से मेरी एक रिक्रूटमेंट एजेंसी पर मुलाकात हुई. वह दिन में एमबीए की कक्षाओं में जाता है और रात को कॉल सेंटर की नौकरी करता है.
बारह हज़ार रूपए महीने की अपनी कमाई अपने पर ही ख़र्च कर देता है. एक साल में उसने दो कॉल सेंटर बदले और अब तीसरी नौकरी की तलाश में है.
चिंता
इस तरह की उथल पुथल कॉल सेंटर के मालिकों के लिए चिंता का विषय बन गई है.
इन नौजवानों के प्रशिक्षण पर वो संसाधन खर्च करते हैं और कुछ ही महीनों में वे नौकरी छोड़ देते हैं.
ऐसी स्थिति से जूझने के लिए ही कई कम्पनियों ने अब चालीस साल से अधिक उम्र के लोगों को नौकरी पर रखना शुरू कर दिया है.
सरकार से और सेना से सेवानिवृति पा चुके कई लोग और गृहणियाँ बड़ी संख्या में कॉल सेंटर में नौकरी के लिए पहुँच रही हैं.
एक 47 वर्षीय गृहणी, क्लेरेंस डि सिल्वा से मेरी मुलाकात हुई. नौजवान लड़कों और लड़कियों के साथ वो एक रोज़गार एजेंसी की क़तार में बैठी थीं.
उन्होंने कहा कि अब उनके बच्चे कॉलेज में हैं और उन्हें समझ नहीं आता कि वो समय का उपयोग कैसे करें. उनकी कुछ सहेलियों ने कॉल सेंटरों में नौकरी ढूँढ ली है, जिससे प्रोत्साहित होकर वो खुद भी नौकरी की तलाश में आई हैं.
उम्र के साथ समस्या
आईटी क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी उम्र के कर्मचारी अपने काम में ज़्यादा रूचि दिखाते हैं. और कुछ अधिक पैसों के लिए जल्दी नौकरी नहीं छोड़ते.
पिछले महीने बंगलौर में हुए नास्कॉम सम्मेलन में इस मुद्दे पर काफ़ी चर्चा हुई कि किस तरह कॉल सेंटर और बीपीओ अपने कर्मचारियों को ज़्यादा समय तक अपने पास रख सकें.
कॉल सेंटर उद्योग में क्रांति लाने का श्रेय विप्रो-स्पेक्ट्रामाइंड के चेयरमैन और एमडी, रमन रॉय को जाता है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "इस समस्या का हल ढूंढने के लिए पूरे उद्योग को दीर्घकालीन नीति पर सोच-विचार करना होगा."
उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी में 50 वर्ष के लोगों को प्रशिक्षण देने में कई समस्याऐं खड़ी हुईं, क्योंकि जो जो लचीलापन कम उम्र के लोगों में दिखता है वो 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में नहीं दिखता.
लेकिन उनके मुताबिक़ विप्रो- स्पेक्ट्रामाइंड में 40-45 वर्ष तक के लोगों के साथ उन्हें सफलता मिली है.
नैक्स्ट रिक्रूटमेंट एजेंसी की रमोला नाथ ने कहा कि कॉल सेंटर की नौकरी के लिए हर दिन उनके यहाँ सौ लोग आते हैं. उसमें से क़रीब दस लोग 45 वर्ष से ऊपर के होते हैं.
लुभाने की कोशिशें
बंगलौर आईटी क्षेत्र में सॉफ्टवेयर ही नहीं बल्कि कॉल सेंटर उद्योग का भी गढ़ माना जाता है.
जैसे-जैसे अमरीका और ब्रिटेन की कंपनियाँ अपना खर्च कम करने के लिए भारत में कॉल सेंटरों की मदद ले रहे हैं, वैसे ही ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों की माँग बढ़ रही है.
जहाँ कंपनियाँ उम्रदराज़ लोगों को नौकरी देने के लिए विवश हो रही है, वहीं कुछ ऑन-लाइन एमबीए का कोर्स शुरू कर इन नौजवानों को अपनी नौकरी में बनाए रखने का प्रयास कर रही है.
हालाँकि इनकी संख्या तीन या चार से अधिक नहीं है.