मंगलवार, 06 जुलाई, 2004 को 19:26 GMT तक के समाचार
आलोक पुराणिक
आर्थिक विश्लेषक
बजट 2004-05 सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उससे आने वाले साल के वित्तीय हिसाब का पता लगेगा,बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे आने वाले करीब पांच सालों की आर्थिक दिशा का हिसाब-किताब पता लगेगा.
मौजूदा सरकार को चलाने वाली शक्तियों और इसे बाहर से समर्थन देने वाली शक्तियों के बीच की खींच-तान के परिणाम इस बजट में दिखायी देंगे.
यह बजट पिछले बजट से भिन्न इस अर्थ में हो सकता है कि पिछले बजट में किसी किस्म की वैचारिक दुविधा नहीं थी.
आर्थिक सुधारों, निजीकरण, विनिवेश के मसले पर किसी किस्म की बहस सरकार के अंदर नहीं थी, पर इस बार ऐसा नहीं है.
वित्तमंत्री के रुप में जिस व्यक्ति यानी मनमोहन सिंह की नीतियों का विरोध वामपंथी पार्टियां करती रही हैं, उसी व्यक्ति द्वारा चलाई जा रही सरकार को वामपंथी पार्टियां बाहर से समर्थन दे रही हैं.
आक्रामक आर्थिक सुधारों के पुरोधा के तौर पर चिन्हित पी चिदंबरम इस सरकार के वित्तमंत्री हैं.
अन्य शब्दों में कहा जाए, तो इस सरकार का नेतृत्व और वित्तीय प्रबंधन ऐसे व्यक्तियों के हाथों में है जिनकी नीतियों का विरोध वामपंथी पार्टियां लगातार करती रही हैं.
ऐसी सूरत में यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि कैसे आर्थिक सुधारों की अपनी चाहतों के पोटले में वामदलों की इच्छाओँ को जगह मिल पाती है.
दबाव
ऐसा दबाव वे बजट निर्माण की प्रक्रिया में भी बनाये रखेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है.
इसके अलावा खबरों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी चाहती हैं कि कृषि, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के क्षेत्रों के लिए उचित इंतजाम किये जाएँ.
रोजगार और कृषि के मामले में कांग्रेस संवेदनशील इसलिए है कि उसका मानना है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के हारने में किसानों और युवा बेरोजगारों की नाराजगी की भी भूमिका थी.
इसके अलावा वामपंथी पार्टियां भी बेरोजगारी के मसले, विनिवेश, निजीकरण के मसले पर दबाव बनाये रखेंगी.
अलग
इस सबको देखते हुए 8 जुलाई को पेश होने वाला बजट, पिछले साल के बजट से अलग यूँ हो सकता है-
1. विनिवेश नहीं
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों को बेचकर संसाधन उगाहने के चलन के इस बजट में ख़त्म होने के आसार हैं.
वामपंथी पार्टियों का रुख़ इस मसले पर साफ है.
वे किसी भी सरकारी संगठन के शेयरों के विनिवेश का समर्थन नहीं करेंगे. इसलिए साफ़ है कि पी चिदंबरम को संसाधन जुटाने की नई-नई तरकीबें खोजनी पड़ेंगी.
2. सेवाओं के कर के दायरे में बढ़ोत्तरी
सेवा क्षेत्र सरकार के लिए एक दुधारु गाय साबित हो रहा है.
1995-96 में सेवा कर के रुप में 862 करोड़ रुपये वसूले गये थे, यह रकम 2003-04 के दौरान करीब 8,300 करोड़ हो गई.
अभी 60 सेवाओँ पर आठ प्रतिशत की दर से कर लगाया जाता है.
उम्मीद है कि आगामी बजट में कर के दायरे में आने वाली सेवाओं में बढ़ोत्तरी की जाएगी.
कर की दर में बढ़ोत्तरी भी संभावित है. सेवा कर के जरिए संसाधन जुटाने पर वामपंथी पार्टियों को भी आपत्ति नहीं होगी.
3. ब्याज दर में कटौती नहीं
ब्याज दरों में कमी के आसार अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं. इसकी वजह यह है कि घटती ब्याज दरों से निवेशकों, जमाकर्ताओं में एक गुस्सा था.
इस गुस्से की अभिव्यक्ति एक हद तक हाल के चुनाव परिणामों में भी हुई. वामपंथी पार्टियां भी ब्याज दर में कटौती के खिलाफ हैं.
4. अमीर किसानों पर कर
किसानों पर, खेती पर कर एक विवादित मुद्दा रहा है. पर संसाधन संग्रह के नये तरीकों की तलाश पी. चिदंबरम को अमीर किसानों पर कर लगाने की ओर ले जा सकती है. गौरतलब है कि यह कदम ऐसा होगा, जिसका वामपंथी पार्टियाँ समर्थन ही करेंगीं.
5. बेरोजगारों ,लघु उद्योगों के लिए कर्ज
बेरोज़गारों के लिए कुछ ख़ास इस बजट में किए जाने की उम्मीद है.
बेरोज़गारों ने कांग्रेस पार्टी को वोट दिया है.
एनडीए सरकार की नीतियों में फ़ीलगुड नहीं किया है. ऐसी धारणा कांग्रेस में बलवती हुई है. इन कदमों का समर्थन वामपंथी पार्टियां भी करेंगी.
कुल मिलाकर बजट आर्थिक उदारवादी नीतियों में वामपंथी छौंक का नमूना साबित हो सकता है.