गुरुवार, 03 जून, 2004 को 14:26 GMT तक के समाचार
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की बढ़ती क़ीमतों का सीधा असर भारत पर पड़ता दिखाई दे रहा है.
तेल की क़ीमतें बढ़कर 42 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं जिससे भारत में तेल का दाम बढ़ना तय हो गया है.
हालांकि तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक की बैठक के बाद तय किया गया है कि क़ीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए क़तर और सऊदी अरब जैसे देश अपना उत्पादन बढ़ाएँगे.
लेकिन तेल की क़ीमतें पहले ही इतना ऊपर जा चुकी हैं कि दुनिया की विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के मंद पड़ने का ख़तरा मँडराने लगा है.
भारतीय उद्योग परिसंघ के प्रमुख विश्लेषक रघु रमन कहते हैं, "अगर तेल की क़ीमतें दस डॉलर प्रति बैरल और बढ़ जाएँ तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 0.5 प्रतिशत होगा जो बहुत अधिक है, भारत सरकार के ख़ज़ाने पर इससे 35 हज़ार करोड़ रूपए का बोझ पड़ेगा."
रघु रमन का कहना है कि यह निश्चित रूप से एक ख़तरनाक स्थिति है और सरकार के लिए इससे निबटना आसान नहीं होगा.
चौतरफ़ा असर
तेल की क़ीमतें बढ़ने से अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि हर उपभोक्ता वस्तु की क़ीमतें बढ़ जाएँगी यानी इससे मुद्रास्फीति की दर बहुत बढ़ सकती है.
दिल्ली के एक उपभोक्ता अनिल चौहान कहते हैं, "इस मूल्य वृद्धि का असर सब पर पड़ेगा, महानगरों में जीवन वैसे ही इतना मँहगा है, पिछले दस वर्षों में हालत बहुत बिगड़ी है."
भारत के तेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस स्थिति पर चिंता प्रकट की है और उन्होंने कहा है कि सरकार स्थिति पर नज़र रखे हुए है.
भारत को पेट्रोल, डीज़ल, किरासन तेल और रसोई गैस की ज़रूरत पूरी करने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में आयात करना पड़ता है.
पिछली एनडीए सरकार ने चुनाव को देखते हुए पहले ही तेल की क़ीमतों को नहीं बढ़ाया था जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमतें कई बार बढ़ी थीं, अब नई सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती होगी कि वह तेल की क़ीमत को एकबारगी किस हद तक बढ़ा सकती है.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता में आते ही तेल की क़ीमतें बढ़ाने का अलोकप्रिय फ़ैसला करना पड़ेगा लेकिन उसके पास कोई और विकल्प नहीं दिखाई दे रहा.
एक दीर्घकालिक तरीक़ा ज़रूर हो सकता है जिसकी तरफ़ दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर बादल मुखर्जी इशारा करते हैं, "जब तक भारत अपना निर्यात जापान की तरह नहीं बढ़ाता तब तक कुछ नहीं हो सकता, एक ही तरीक़ा है कि निर्यात से होने वाली कमाई से तेल ख़रीदा जाए तो अर्थव्यवस्था पर बोझ नहीं बढ़ेगा."
लेकिन यह तरीक़ा ऐसा है जिसे रातोरात नहीं अपनाया जा सकता, निर्यात बढ़ाना एक ऐसा काम है जिसमें समय भी लगेगा और यह अन्य बातों पर निर्भर है.