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कौशिक बासु
आर्थिक विश्लेषक

भाजपा की हार का आर्थिक पहलू

यह तो किसी को नहीं पता कि भविष्य के गर्त में क्या छुपा है लेकिन मैं इस पर ज़रूर ख़ुश हूँ कि भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में हार मिली है.

मेरे ऐसा कहने से लोग ऐसा सोच सकते हैं कि मैं भाजपा की आर्थिक नीतियों को ख़ारिज करता हूँ.

पिछले कुछ दिनों में इस बारे में काफ़ी कुछ लिखा और कहा गया है कि लोगों ने भाजपा सरकार को बाहर करके उसकी आर्थिक नीतियों को भी किस तरह से ख़ारिज कर दिया है.

लेकिन यह याद रखना चाहिए कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की आर्थिक नीतियाँ पूर्ववर्ती कांग्रेसी नीतियों से कुछ ज़्यादा अलग नहीं रहीं.

भारत में 1991 से ही समान आर्थिक नीतियाँ अपनाई जा रही हैं और मेरी नज़र में सिर्फ़ एक ख़ामी के अलावा ये नीतियाँ व्यापक तौर पर सही ही हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि भारत की आर्थिक नीतियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मीडिया में जो जगह मिली उस माहौल में सरकार यह भूल गई कि देश का बड़ा तबका ग़रीबी में जी रहा है.

हालाँकि ये ग़रीब लोग अख़बारों में कॉलम नहीं लिखते और न ही टीवी वग़ैरा पर अपनी राय रख सकते लेकिन नेता लोग यह भूल जाते हैं कि ये लोग अपनी राय वोट के ज़रिए देते हैं जो बहुत निर्णायक होती है.

नई कांग्रेस करकार को अंतरराष्ट्रीय कारोबार, विदेशी निवेश और श्रम क़ानून जैसे क्षेत्रों में उन्हीं नीतियों पर आगे बढ़ना होगा जिन्हें भाजपा सरकार ने शुरू किया था.

आर्थिक नीतियों का अंतिम उद्देश्य ग़रीबों की हालत में सुधार ही होना चाहिए और इसके लिए ज़रूरी होगा कि आमदनी में फ़र्क़ को कम किया जाए.

सुविधा और समस्या

सरकारें अक्सर ऐसा फ़ैसला कर लेती हैं जिनसे लोगों को तो कुछ फ़ायदा पहुँचता नज़र आता लेकिन उनसे बहुत सी समस्याएं पैदा हो जाती हैं जैसे कि आंध्र प्रदेश के नए मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने किसानों को बिजली मुफ़्त देने का फ़ैसला किया है.

ऐसी नीतियों में एक बात भुला दी जाती है कि इससे आर्थिक क्षेत्र में दूसरी तरह की जटिल समस्याएं पैदा हो जाती हैं जो नज़र नहीं आती हैं लेकिन उनका असर बड़ा होता है.

अर्थव्यवस्था में ऐसी नीतियों से वित्तीय घाटा बढ़ता है जिससे देश की निवेश दर में कमी हो सकती है और दीर्घकालीन दृष्टि से देश की आर्थिक प्रगति को भी प्रभावित हो सकती है.

अगर अपनी सही आर्थिक नीतियों के बावजूद भाजपा हार गई तो इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि वह अपने प्रस्तुतिकरण में स्पष्ट नहीं थी और देश में सांप्रदायिकता का बढ़ना भी इसमें सहयोगी बनता नज़र आया.

पिछली सर्दियों में मैंने भारत के कुछ गाँवों का दौरा किया तो ज़्यादातर लोग ऐसे लगे जो सांप्रदायिकता से तंग आ चुके थे जो भाजपा के शासनकाल में बढ़ी है.

यहाँ तक कि गुजरात के हिंदू बहुल गाँवों में भी सिर्फ़ एक आदमी को छोड़कर सभी लोग ऐसे मिले जो सांप्रदायिक दंगों के दौरान हुए नरसंहार पर शर्मिंदा थे, हालाँकि उनके लिए आज भी राजनीति से कहीं ज़्यादा पानी और बिजली से सरोकार है.

अगर सरकार दंगों के दोषियों को सज़ा दिला पाती तो हो सकता है कि कुछ लोग प्रदर्शन करते लेकिन एक बड़ा तबका उसका सम्मान करता.

कुछ इस तरह की भी ख़बरें मिली हैं कि भाजपा का मुसलमानों में तो जनाधार रहा ही नहीं है, इस बार हिंदुओं में भी उसका जनाधार घटा है.

धर्म के नाम पर हिंदू कट्टरवाद और हिंसा में बढ़ोत्तरी से ख़ुद हिंदुत्व का ही ऐसा नुक़सान हो सकता है जो किसी विदेशी शासन से नहीं हुआ.

बहुत से हिंदू इस बात को समझने लगे हैं और उन्होंने इस चुनाव में मतों के ज़रिए अपने विरोध दर्ज कराया है.