बैंक ऑफ़ क्रेडिट एंड कॉमर्स इंटरनेशनल यानी बीसीसीआई के डूबने के मामले में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है.
दस अरब पाउंड यानी क़रीब अस्सी अरब रुपए की पूँजी वाला बैंक बीसीसीआई 1991 में डूब गया था.
इस बैंक के निवेशक डेलॉइटी एंड टॉश ने बैंक ऑफ़ इंग्लैंड पर क़रीब एक अरब पाउंड के हर्जाने का मुक़दमा कर दिया है.
उनका आरोप है कि इस बैंक की निगरानी की ज़िम्मेदारी बैंक ऑफ़ इंग्लैंड पर थी और उसने यह ज़िम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभाई.
इस मामले की सुनवाई मंगलवार को हो रही है.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड अपने तीन सौ साल के इतिहास में पहली बार इस तरह के मुक़दमे का सामना कर रहा है.
बीबीसीआई के खातेदारों, निवेशकों और कर्मचारियों के पक्ष में खड़े सांसद कीथ वाज़ का कहना है कि यह मुक़दमा पैसे की बर्बादी है और खातेदारों को उनका पैसा दे दिया जाना चाहिए.
उनका कहना है कि यदि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की हार होती है तो करदाताओं की जेब से पैसा जाएगा और यदि निवेशक हार जाते हैं तो खातेदारों का नुक़सान होगा.
जाल
1972 में कुछ 'बड़े' पाकिस्तानियों ने मिलकर बीसीसीआई की स्थापना की थी.
इसकी शाखाएँ साठ देशों में थीं और इसका नियंत्रण बैंक ऑफ़ इंग्लैंड, केमैन आइलैंड और लक्ज़मबर्ग में बँटा हुआ था.
जब इसे बंद करने की नौबत आई तो दिक्कतें शुरु हो गईं.
1980 के दशक में सबूत मिले कि बीसीसीआई के ताल्लुक़ चरमपंथी संगठनों, अरब के हथियार सौदागरों और दक्षिण अमरीका के नशीली दवा के माफ़िया से थे.
यह क़ानूनी इतिहास में अब तक का सबसे महंगा हर्जाने का दावा है.
दावा करने वालों का कहना है कि बीसीसीआई को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने ग़लत तरीक़े से लाइसेंस दिया और समय रहते लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई भी नहीं की.
इस बैंक में ब्रिटेन के ही 6,500 खातेदार थे.
डेलॉइटी के वकीलों का तर्क है कि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई.