एक ज़माना था जब कोलकाता को जूट मिलों का पर्याय माना जाता था और वे जीवनदायी थे लेकिन अब हालत है कि ज़्यादातर मिलों की हालत खस्ता है और मज़दूर बेहाल हैं.
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से लाखों मज़दूर काम करने यहाँ पहुँचते थे और ये मिलें नई दुल्हनों के लिए सौत बनी हुई थीं.
''लागा नथुनिया के धक्का बलम कलकत्ता पहुँच गए'' जैसे कितने ही लोकगीत इस विरह की पीड़ा को ही दर्शाते थे.
पीढ़ी दर पीढ़ी लोग जूट मिलों में काम किया करते थे.
चंद्रिका प्रसाद कहते हैं, ''वे भी क्या दिन थे जब मिलों की चिमनियाँ सिर्फ़ धुआँ नहीं बल्कि सोना भी उगलती थीं. अब तो सब बदल ही गया है.''
65 साल के चंद्रिका प्रसाद बिहार के सासाराम ज़िले से कोई पचास साल पहले अपने पिता के साथ कोलकाता पहुँचे थे.
उनके दादा भी जूट मिल में काम करते थे.
दिन बदल गए
सत्तर के दशक तक तो सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन आज हालत यह है कि हुगली के किनारे बनी लगभग चार सौ जूट मिलों में से आधी तो बंद हो गई हैं और जो खुली भी हैं उनकी हालत ख़राब है.
महानगर कोलकाता के कितने ही उपनगर भोजपुरियों ने ही आबाद किए थे लेकिन अब वे बस्तियाँ वीरान हो चली हैं.
ज़्यादातर लोग मिलों के बंद होने के बाद से बोरिया बिस्तर समेटकर अपने गाँव लौट गए.
जो बचे हुए हैं वे या तो रिटायर होने के बाद मिलने वाली सुविधाओं की बाट जोह रहे हैं या फिर किसी और काम धंधे से जुड़ चुके हैं.
आख़िर इन मिलों की ऐसी हालत क्यों है?
इस सवाल के जवाब में जूट मिलों के मालिक तो कहते हैं कि जूट की अब पहले जैसी मांग नहीं रही, मशीनें पुरानी हो चुकी हैं और इनके आधुनिकीकरण के लिए पैसा नहीं है.
लेकिन मजदूर संगठनों का कहना है कि वामपंथी मज़दूर संगठनों के उग्र आंदोलनों, राज्य की ग़लत उद्योग नीतियों और मिल मालिकों की फूट डालो मिल चलाओ की नीति ने ज़्यादातर मिलों को बदहाली के कगार पर धकेल दिया.
इटक के प्रदेश महासचिव गणेश सरकार का आरोप है, ''राज्य में वाममोर्चा की सरकार आने के बाद से ही जूट मिलों की हालत बिगड़ी है.''
वरिष्ठ मजदूर नेता मास्टर निज़ाम भी राज्य सरकार को दोषी मानते हैं.
वे मानते हैं, ''सत्तारुढ़ पार्टी से जुड़ी यूनियनों ने मालिकों से अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा का जो रास्ता अख़्तियार किया उसी ने धीरे धीरे मिलों को निगल लिया.''
और इधर मज़दूर संगठनों की संख्या भी बहुत बढ़ी है. कई मिलों में तो एक दर्जन तक मज़दूर संगठन हैं.
ज़मीनों पर नज़र
हालांकि राज्य के श्रम मंत्री मोहम्मद अमीन ऐसा नहीं मानते.
उनका कहना है कि उल्टे सरकार की पहल पर कई बंद मिलें दोबारा खुली हैं.
आरोप प्रत्यारोपों के बीच तथ्य यह है कि त्रिपक्षीय बैठकों के बाद जब तक कोई एक मिल खुलती है तब तक तीन और मिलें बंद हो चुकी होती हैं.
एक तो मिल मालिकों की नई पीढ़ी का अंदाज़ अलग है और वे पूरी तरह व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ मिल चलाना चाहते हैं.
और दूसरी ओर मज़दूर संगठनों में वर्चस्व की आपसी लड़ाई है.
इसके चलते मालिक ने अपनी शर्तों पर मिल चलाने लगे.
स्थाई नौकरी ख़त्म हो गईं और मज़दूरों की छँटनी का क्रम भी शुरु हो गया.
मिल मालिकों ने मज़दूरों के भविष्य निधि, ग्रेच्युटी और चिकित्सा बीमा के लिए अपना अंशदान देना बंद कर दिया है.
इधर निर्माण के धंधे में होने वाले मुनाफ़े ने भी मिल मालिकों को मिल बंद करने की प्रेरणा दी है.
हर मिल के पास काफ़ी ज़मीन है जो सरकार से कभी पानी के मोल ख़रीदी गई थी.
अब प्रमोटरों की गिद्ध नज़र इन ज़मीनों पर है.
कई पुरानी मिलों की जगह अब बहुमंजिली इमारतें खड़ी हैं.
अब मिलों का बंद होना अख़बारों के लिए कोई बड़ी ख़बर नहीं बनती. अक्सर ये ख़बरें अब भीतरी पन्नों पर ही छपती हैं.