क्या आप अकेले खाना खाते हैं, जानिए साथ बैठकर खाने के फ़ायदे

    • Author, डेविड रॉबसन और अलेसिया फ्रांको
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

शायद ये यक़ीन करना मुश्किल हो, लेकिन आपकी खाने की आदतों में एक छोटा सा बदलाव आपके शरीर और दिमाग़ के लिए बहुत फ़ायदेमंद हो सकता है.

इससे डिप्रेशन का ख़तरा कम हो सकता है और आप डिमेंशिया से बच सकते हैं. इससे खाने का आनंद बढ़ सकता है और शायद आपकी उम्र भी लंबी हो सकती है.

हम इंसान की सबसे पुरानी आदतों में से एक की बात कर रहे हैं. यह आदत है- कमेन्सैलिटी यानी दूसरों के साथ खाना खाना.

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स और बिहेवियरल साइंस के प्रोफ़ेसर जैन-इमैनुएल डी नेव कहते हैं, "खाना शेयर करना आपसी रिश्ता मज़बूत करने, भरोसा बनाने और दूसरों से जुड़ने का एक ज़रूरी ज़रिया है." और इसका हमारी सेहत और ख़ुशहाली पर गंभीर असर पड़ता है.

अफ़सोस की बात है कि आज की दुनिया में लोगों के बीच बढ़ती दूरी की वजह से साथ बैठकर खाने का चलन कम होता जा रहा है.

लेकिन दूसरों से जुड़ना और खाने-पीने के ज़रिए दोस्ती का पुराना रिश्ता बनाना, आपकी सोच से कहीं ज़्यादा आसान हो सकता है.

साथ खाने से मिल सकती है मानसिक मजबूती

कमेन्सैलिटी पर हुए ज़्यादातर रिसर्च में इसके हमारी मानसिक सेहत पर पड़ने वाले असर पर ध्यान दिया गया है.

चीन में झेजियांग प्रोविंशियल 'सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' में शिनयी वांग और उनके साथियों ने एक स्टडी की.

इसमें 60 साल और उससे ज़्यादा उम्र की 9,361 महिलाओं का सर्वे किया गया.

स्टडी में पाया गया कि खाने के समय मेज़ के चारों ओर बैठने वाले लोगों की संख्या, किसी व्यक्ति में डिप्रेशन के ख़तरे का स्पष्ट संकेत थी.

यह नतीजा तब भी बरक़रार रहा जब शोधकर्ताओं ने लोगों की भलाई पर असर डालने वाले कई दूसरे कारकों, जैसे उनकी आम सेहत, आर्थिक स्थिति और वे अकेले रहते हैं या नहीं, को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया.

शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि इससे पता चलता है कि दूसरों के साथ खाना खाने की आदत में कुछ ऐसा ख़ास है, जो हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित करता है.

कई दूसरी स्टडीज़ भी इसी नतीजे की ओर इशारा करती हैं. मसलन, टोक्यो के शोधकर्ताओं ने पाया कि 65 से 74 साल की उम्र के वे लोग जो अपने परिवार के साथ रहते थे, लेकिन अकेले खाना खाते थे, उनमें नियमित रूप से दूसरों के साथ खाना खाने वाले लोगों की तुलना में डिप्रेशन के लक्षण विकसित होने की आशंका पाँच गुना ज़्यादा थी.

शायद सबसे मज़बूत सबूत वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट से मिलता है. यह दुनियाभर में लोगों की राय जानने वाली कंपनी गैलप के वैश्विक सर्वे पर आधारित ख़ुशहाली का सालाना विश्लेषण है.

2024 में, जापानी फ़ूड मैन्युफ़ैक्चरर कंपनी 'अजिनोमोटो' ने लोगों की खाने-पीने की आदतों पर एक सेक्शन जोड़ने के लिए स्पॉन्सर किया, जिसमें ये सवाल शामिल थे:

(1) पिछले सात दिनों में आपने कितने दिन अपने किसी परिचित के साथ दोपहर का खाना खाया?

(2) पिछले सात दिनों में आपने कितने दिन अपने किसी परिचित के साथ रात का खाना खाया?

डी नेव ने हाल की वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में कमेन्सैलिटी की अहमियत पर एक अध्याय लिखा है.

वह कहते हैं, "जब मैंने इसे देखा तो मेरी आँखें चमक उठीं. हम दुनियाभर के क़रीब 1,50,000 लोगों की बात कर रहे हैं, जिन्होंने इस सवाल का जवाब दिया."

डी नेव की टीम ने पाया कि लोग जितना ज़्यादा खाना दूसरों के साथ शेयर करते थे, इमोशनल वेलबीइंग यानी भावनात्मक ख़ुशहाली के मानक पैमानों पर उनका स्कोर उतना ही ज़्यादा था.

यह नतीज़ा निरंतरता के साथ सामने आया, जो कि काफ़ी हैरान करने वाला था.

वह कहते हैं, "यह किसी व्यक्ति की जीवन संतुष्टि का उतना ही अच्छा संकेत था, जितना उसका रोज़गार और उसकी तुलनात्मक आय."

ये दो ऐसे कारक हैं, जिन्हें ख़ुशहाली के लिए बहुत अहम माना जाता है.

खाना शेयर करने से कैसे फ़ायदा होता है?

डी नेव इस बात पर ज़ोर देते हैं कि साथ खाना खाने से जुड़े सवाल शायद किसी व्यक्ति के सामान्य सामाजिक जीवन के 'संकेतक' के रूप में काम करते हों, लेकिन उन्हें लगता है कि साथ खाना खाने में कुछ ख़ास बात है.

वह बताते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द 'कम्पेनियन' लैटिन के शब्दों 'कम' और 'पैनिस' से बना है, जिनका मतलब है 'रोटी के साथ'.

वहीं इसी अवधारणा के लिए इस्तेमाल होने वाला चीनी शब्द 'हुओ बैन' उन अक्षरों से बना है, जो किचन के एक ही स्टोव को शेयर करने वाली सैन्य टुकड़ी के बारे में बताते हैं.

वह कहते हैं, "इसकी सांस्कृतिक जड़ें बहुत गहरी हैं."

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के जैविक मानवविज्ञानी रॉबिन डनबर अपनी किताब 'फ़्रेंड्स' में कहते हैं कि खाना स्वाभाविक रूप से एंडॉर्फ़िन सिस्टम को एक्टिव करता है.

एंडॉर्फ़िन वे केमिकल हैं, जो हमें अच्छा महसूस कराते हैं और हमारे भीतर ख़ुशी पैदा करते हैं. इससे खाने के दौरान बना रिश्ता और मज़बूत हो सकता है और हमें दूसरों से ज़्यादा जुड़ाव महसूस हो सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि दूसरे लोगों की मौजूदगी खाने के आनंद को भी बढ़ा सकती है.

पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में एरिका बूथबी की ओर से की गई कई स्टडीज़ में पाया गया कि दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी में चॉकलेट खाने वाले लोगों को उसका स्वाद काफ़ी बेहतर लगा.

डिमेंशिया का ख़तरा कम

साथ खाना खाने से दिमाग़ की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी धीमी हो सकती है.

2025 में जापानी शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग नियमित रूप से अकेले खाना खाते हैं, उनके दिमाग़ के उन अहम हिस्सों का आकार कम होता है, जो ज्ञान संबंधी क्षमता से जुड़े हैं. इनमें मीडियल टेम्पोरल लोब और हिप्पोकैम्पस शामिल हैं.

हालांकि इनमें से कुछ अंतर सीधे डाइट से जुड़े नज़र आए. आम तौर पर अकेले खाना खाने वाले लोग कम पौष्टिक भोजन खाते हैं, लेकिन सिर्फ़ यही वजह नहीं हो सकती.

इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक जुड़ाव में कमी भी लंबे समय में उनके दिमाग़ की सेहत को प्रभावित कर रही थी.

लेखकों का अनुमान था कि साथ मिलकर खाना खाने से मिलने वाली ख़ुशी और बेहतर सोशल सपोर्ट तनाव को कम कर सकता है, क्योंकि तनाव न्यूरल डिक्लाइन यानी दिमाग़ की कार्यक्षमता में गिरावट के लिए एक जाना-माना रिस्क फ़ैक्टर है.

एक दूसरी संभावना यह है कि भोजन के दौरान होने वाली बातचीत दिमाग़ को अतिरिक्त मानसिक सक्रियता देती है, जिससे बुढ़ापे तक दिमाग़ सक्रिय रह सकता है.

स्टडी के दौरान इसमें शामिल लोगों का कॉग्निटिव फंक्शन यानी ज्ञान संबंधी क्षमता सामान्य मानी गई थी, लेकिन शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि दिमाग़ में यह गिरावट आगे चलकर उनमें डिमेंशिया का ख़तरा बढ़ा सकती है.

दुनिया में साथ खाने-पीने का कल्चर

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग-अलग देशों में खाने की आदतें काफ़ी अलग हैं. ऐसे में हम किसी एक देश के उस प्रयास से बहुत कुछ सीख सकते हैं, जो मिल-जुलकर ख़ुशी से रहने के अपने कल्चर को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है.

जापान में लोग औसतन हफ़्ते में चार से कम बार साथ खाना खाते हैं.

ब्रिटेन और अमेरिका में यह संख्या क़रीब सात से आठ है, जबकि इटली में यह लगभग नौ तक पहुँच जाती है.

इटली अपने मिलनसार खान-पान के कल्चर के लिए जाना जाता है. जब यूनेस्को ने इतालवी खान-पान को इंटैन्जिबल कल्चरल हैरिटेज का दर्जा दिया, तो संगठन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भोजन "परिवार और समुदाय से जुड़ने" में अहम भूमिका निभाता है, चाहे यह घर पर हो, स्कूलों में हो या त्योहारों, समारोहों और सामाजिक आयोजनों में.

इसलिए शायद यह हैरानी की बात नहीं है कि आधुनिक दुनिया के दबावों के बीच साथ खाना खाने के अपने कल्चर को बचाने के तरीक़े तलाशने में भी इटली आगे है.

इटली से शुरू हुआ स्लो फ़ूड मूवमेंट 50 साल पहले फ़ास्ट फ़ूड की बढ़ती लोकप्रियता के सीधे जवाब में शुरू हुआ था.

यह आंदोलन स्थानीय परंपराओं को बचाने और टिकाऊ उपभोग को बढ़ावा देने के अपने लक्ष्यों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसने लंबे समय से हमारे दिन को साथ खाना खाने के इर्द-गिर्द रखने की अहमियत पर भी ज़ोर दिया है.

स्लो फ़ूड इटालिया की अध्यक्ष बारबरा नाप्पिनी बताती हैं, "इटली में खाना शेयर करना अपने आप में एक फिलॉसफी है. साथ खाना बनाना और मेज़ पर रखे जाने वाले खाने की तैयारी को शेयर करना. इसके लिए केयर और धैर्य की ज़रूरत होती है."

दोस्ती के लिए साथ खाना

इसके बावजूद 21वीं सदी के दबावों ने इटली के कई लोगों को पहले से ज़्यादा अकेला महसूस कराया है. लेकिन अगर आप अकेले खाना नहीं खाना चाहते, तो इसका समाधान आपके सोचने से आसान हो सकता है.

हो सकता है कि आपके आस-पास ऐसे लोग हों जो आपके साथ खाना खाने का मौका पाकर बहुत खुश होंगे.

कई स्टडीज़ से पता चलता है कि लोग इस तरह के न्योतों को स्वीकार करने के लिए हमारी उम्मीद से कहीं ज़्यादा तैयार रहते हैं.

आम तौर पर हम इस बात को कम करके आँकते हैं कि लोगों को हमारी संगत कितनी पसंद है और वे हमारे साथ कितना समय बिताना चाहते हैं.

इसलिए अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो शायद अकेलापन महसूस कर रहा हो और अच्छे खाने के साथ बातचीत के मौक़े को पसंद करे, तो सबसे अच्छा तरीक़ा बस उसे पूछना है.

और अगर आपको सच में किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचना मुश्किल लग रहा है, तो तकनीक भी इसका समाधान दे सकती है.

2019 में इतालवी टेक उद्यमी पाओलो बावारो ने अकेले खाना खाने वाले लोगों को जोड़ने के लिए टैब्लो ऐप शुरू किया. अब तक इसका इस्तेमाल 3,00,000 से ज़्यादा बार किया जा चुका है.

शायद यह हैरानी की बात नहीं है कि इसका औसत यूज़र युवा है. उसकी उम्र क़रीब 30 साल है.

बावारो कहते हैं, "उस उम्र में दोस्त बनाना मुश्किल होता है. आप बहुत काम करते हैं, आपके कई दोस्तों के परिवार होते हैं. आप लोगों के साथ समय बिताना चाहते हैं, लेकिन आपको पता नहीं होता कि बाहर किसके साथ जाएँ."

बावारो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनका ऐप किसी ख़ास "क़िस्म" के व्यक्ति के लिए नहीं है और इसे डेटिंग ऐप नहीं समझना चाहिए.

इसका मक़सद लोगों का सामाजिक दायरा उस उम्र में बढ़ाना है, जब उन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है.

जब हमने डी नेव को इस ऐप के बारे में बताया, तो उन्होंने स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक जमील ज़की के एक प्रयोग का ज़िक्र किया.

ज़की ने शर्मीले मिज़ाज के स्टूडेंट्स के लिए कैंपस की कॉफ़ी शॉप में मिलने के "प्लैटोनिक डेट्स" का इंतज़ाम करने में मदद की थी. इस पहल से स्टूडेंट्स का सामाजिक आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिली. डी नेव के मुताबिक़, इस तरह के हस्तक्षेप "काफ़ी लंबे समय तक फ़ायदा पहुँचा सकते हैं."

इस तरह साथ खाना खाने से शायद आपको ऐसी दोस्ती मिल जाए, जो लंबे समय तक चले. साथ ही इस प्रक्रिया में आपकी सेहत और ख़ुशहाली भी बेहतर हो सकती है.

डेविड रॉबसन एक अवॉर्ड विनिंग साइंस राइटर हैं. और अलेसिया फ्रांको इतिहास, संस्कृति, समाज, स्टोरीटेलिंग और लोगों पर इसके प्रभाव जैसे विषयों पर लिखने वाली पत्रकार हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.