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काबुल के 'महाविनायक': कब और कैसे अफ़ग़ानिस्तान में मिले प्राचीन गार्देज़ गणपति?
- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
यह मई 1956 की बात है. भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की एक टीम अध्ययन करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान गई थी.
काबुल में इस टीम को एक ऐसी जानकारी मिली, जिसने एक भारतीय देवता की कहानी में थोड़ा नया और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया.
टीम के सदस्यों को गणेश की एक मूर्ति के बारे में बताया गया. संगमरमर से बनी यह मूर्ति 20वीं सदी में काबुल से करीब 70 किलोमीटर दूर गार्देज़ के पास मिली थी.
इस मूर्ति को काबुल की दरगाह पीर रतन नाथ में रखा गया था. शहर में रहने वाले हिंदू इसकी पूजा भी करते थे.
कैसा था काबुल के 'महाविनायक' का रूप
साल 1956 में अफ़ग़ानिस्तान गई टीम में पुरातत्व विभाग के दो अधिकारी टीएन रामचंद्रन और वाईडी शर्मा भी शामिल थे.
दोनों अधिकारियों ने इस मूर्ति पर अपनी रिपोर्ट नई दिल्ली में जमा की थी.
रिपोर्ट में मूर्ति के आकार और बनावट के बारे में बताया गया था. मूर्ति के नीचे लिखे शिलालेख को भी इसमें शामिल किया गया था.
इसके बाद भी अफ़ग़ानिस्तान और ख़ासकर उसके पूर्वी हिस्से पर रिसर्च करने वाले कई पुरातत्वविदों ने इस मूर्ति के बारे में लिखा.
इतिहासकार और पुरातत्वविद मधुकर केशव ढवलीकर ने इस मूर्ति का ज़िक्र करते हुए लिखा, "यह मूर्ति इंडो-अफ़ग़ान कला का उदाहरण है. इसे कम गुणवत्ता वाले संगमरमर से बनाया गया है. इसकी ऊंचाई 24 इंच और चौड़ाई 14 इंच है."
मूर्ति में देवता को खड़े हुए दिखाया गया है. उनका सिर हाथी का है. सूंड टूटी हुई है, लेकिन उसे देखकर लगता है कि वह बाईं तरफ़ मुड़ी हुई थी.
देवता की चार भुजाएं हैं, लेकिन वे भी टूटी हुई हैं.
कमर पर बाघ की खाल बंधी है. गले में सांप को जनेऊ की तरह पहना गया है.
मूर्ति का पेट बड़ा है. यह गणपति के 'लंबोदर' रूप से मिलता है.
मूर्ति की मज़बूत भुजाएं और चौड़े कंधे इंडो-ग्रीक कला का असर दिखाते हैं. वहीं, सिर पर पहना गया मुकुट फ़ारसी यानी ईरानी कला से जुड़ा है. यह ऐसा मुकुट है, जिसे रिबन से बांधा जाता था.
यही वजह है कि पुरातत्वविद और कला इतिहासकार इस मूर्ति को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.
यह मूर्ति भारतीय, गांधार यानी इंडो-ग्रीक और फ़ारसी संस्कृतियों के मेल का प्रतीक है.
काबुल के 'महाविनायक' की मूर्ति कितनी पुरानी है?
पहले समझिए कि ये कैसे पता चला कि मूर्ति किस देवता की है? दरअसल, मूर्ति के निचले हिस्से में दो पंक्तियों का एक शिलालेख लिखा है. इतिहासकार और शिलालेखों के जानकार डीसी सरकार ने इसका अध्ययन किया था.
उनके मुताबिक़, यह शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी सिद्धमात्रिका लिपि में लिखा गया है.
इसमें व्याकरण की कुछ ग़लतियां हैं. तस्वीरों के आधार पर इसके कुछ शब्दों का मतलब समझना भी मुश्किल है.
हालांकि, शिलालेख का सार कुछ इस तरह है:
"महाराजाधिराज शाही खिंगल ने अपने शासन के आठवें साल में महाज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को विशाखा नक्षत्र और सिंह लग्न में इस महाविनायक की मूर्ति स्थापित कराई."
पुरातत्वविदों के बीच इस बात को लेकर एक राय नहीं है कि खिंगल राजा आख़िर कौन था.
इस इलाक़े में पांचवीं और छठी सदी के दौरान खिंगल नाम के कम से कम दो राजा हुए थे. इसके सबूत मिले हैं. उस समय यहां हूणों का शासन था.
मूर्ति बनाने की कला और शिलालेख की लिपि को देखकर विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि यह मूर्ति पांचवीं या छठी सदी की हो सकती है.
इतिहासकार और पुरातत्वविद मधुकर केशव ढवलीकर के मुताबिक़, यह मूर्ति पांचवीं सदी के आख़िरी वर्षों की हो सकती है.
लेकिन काबुल में पुरातत्वविदों को गणेश की केवल यही एक मूर्ति नहीं मिली थी.
साल 1956 में जमा की गई रिपोर्ट में एक और मूर्ति का ज़िक्र है.
यह दूसरी मूर्ति काबुल से करीब 10 मील उत्तर में सकर धर (ऐतिहासिक रूप से इसे शंकर धर माना जाता है) नाम की जगह पर मिली थी. बाद में इसे काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में लाया गया था.
ढवलीकर ने अनुमान लगाया है कि यह मूर्ति चौथी सदी के बीच के समय की हो सकती है.
काबुल के गणपति का आगे क्या हुआ?
सकर धर और गार्देज़ में मिली गणेश की मूर्तियों की कहानी पढ़ते हुए मन में ये सवाल ज़रूर आता है कि ये मूर्तियां आज कहां होंगी?
दुर्भाग्य से इस बारे में कहीं कोई पक्की जानकारी नहीं मिलती.
कुछ जगहों पर ज़िक्र मिलता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत हमले के बाद गार्देज़ की मूर्ति को काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में ले जाया गया था.
लेकिन साल 1996 के बाद तालिबान के शासन में इस संग्रहालय को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया गया.
कई मूर्तियां नष्ट हो गईं या चोरी कर ली गईं. इसलिए अब इस मूर्ति की केवल तस्वीरें ही देखी जा सकती हैं.
इन मूर्तियों को गणपति की सबसे प्राचीन मूर्तियों और तस्वीरों में शामिल किया जाता है.
आज भारत के अधिकतर हिस्सों में गणपति के जिस रूप की पूजा होती है, ये मूर्तियां उससे कुछ अलग दिखाई दे सकती हैं.
ऐसे में एक सवाल उठता है. क्या गणपति भारत से वहां पहुंचे थे या गणेश की पूजा करने की परंपरा वहां से भारत आई थी?
गणपति की पूजा कहां शुरू हुई, इसका कोई पक्का जवाब नहीं दिया जा सकता.
लेकिन समय के साथ उनकी पूजा और रूप में कैसे बदलाव आया, इसके कुछ संकेत धार्मिक ग्रंथों में मिलते हैं.
गणपति का रूप कैसे बदलता गया?
गणपति की आरती के बाद जो मंत्र पढ़े जाते हैं, उनमें ऋग्वेद की कुछ ऋचाएं शामिल हैं.
आमतौर पर सबसे पहले पढ़े जाने वाले मंत्र में गणपति का नाम आता है.
आपने भी कभी न कभी यह मंत्र सुना होगा, "गणानां त्वां गणपतिं हवामहे."
लेकिन ऋग्वेद में जिस गणपति का ज़िक्र हुआ है, वह हाथी के सिर वाले आज के गजानन नहीं हैं. वहां गणपति का मतलब बृहस्पति देवता से है.
ऋग्वेद में मुख्य रूप से कुबेर, इंद्र और अग्नि जैसे देवताओं का वर्णन मिलता है.
लेकिन ऋग्वेद के बाद लिखे गए ग्रंथों में कई दूसरी देवताओं का भी ज़िक्र मिलने लगता है.
ईसा पूर्व पांचवीं सदी में धार्मिक विधियों पर 'मानवगृह्यसूत्र' नाम का ग्रंथ लिखा गया था.
इसमें चार विनायकों का ज़िक्र है. इनके नाम हस्तिमुख, वक्रतुंड, दंतिन और लंबोदर हैं.
कई जानकारों का अनुमान है कि आगे चलकर इन चारों विनायकों के रूप एक विनायक में मिल गए.
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि समय के साथ गणपति के वर्णन और गुणों में बदलाव आता गया.
धीरे-धीरे बदला गणपति का रूप
पुरातत्वविद और मानव विज्ञान के जानकार कुरुश एफ दलाल कहते हैं, "शुरुआत में गणपति विघ्नहर्ता यानी मुश्किलें दूर करने वाले देवता नहीं थे. उन्हें विघ्नकर्ता यानी मुश्किलें पैदा करने वाला माना जाता था."
"मान्यता थी कि अगर आपने उन्हें महत्व नहीं दिया, तो वह आपके रास्ते में मुश्किलें खड़ी कर देंगे. इसलिए सबसे पहले उन्हें प्रसन्न करना ज़रूरी था."
"लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे गणपति का रूप बदलता गया."
लेखक और पौराणिक कथाओं के जानकार देवदत्त पटनायक ने अपनी किताब '99 थॉट्स ओन गणेश' में गणपति के रूप और उनकी पूजा के तरीक़ों में आए बदलाव के बारे में लिखा है.
पटनायक बताते हैं कि पहले हिंदू लोग यज्ञ करते थे. मंत्र पढ़कर देवताओं को बुलाया जाता था और आग में हवन सामग्री चढ़ाई जाती थी.
लेकिन धीरे-धीरे पूजा का एक नया तरीक़ा आम लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ. लोग मूर्तियों की पूजा करने लगे.
पटनायक लिखते हैं, "ईसा पूर्व 326 में अलेक्ज़ेंडर यानी सिकंदर ने भारत पर हमला किया. इसके कुछ साल बाद मौर्य साम्राज्य का देश के बड़े हिस्से में विस्तार हुआ."
"उस समय के कई इंडो-ग्रीक सिक्कों पर हाथी या हाथी जैसी आकृतियां बनी दिखाई देती हैं."
"इसी वजह से कई लोगों का मानना है कि यूनानी संस्कृति के असर से गणेश की मूर्ति का रूप बना होगा."
पटनायक आगे लिखते हैं कि भारत आने से पहले यूनानियों ने मिस्र पर क़ब्ज़ा किया था.
मिस्र में ऐसे कई देवी-देवताओं की तस्वीरें मिलती हैं, जिनका शरीर इंसान जैसा और कोई हिस्सा जानवर जैसा दिखाया गया है.
हो सकता है कि इन अलग-अलग संस्कृतियों के मिले-जुले असर से हाथी के सिर वाले देवता की पूजा शुरू हुई हो.
वह लिखते हैं, "आगे चलकर रोमन साम्राज्य के समय व्यापार के कारण रोमन लोग भी भारत के संपर्क में आए."
"रोमन देवता जानस और गणपति के गुणों में भी काफ़ी समानता है. दोनों को बाधाओं और बदलाव से जोड़कर देखा जाता है."
पटनायक कहते हैं, "हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं कि यूनानी, रोमन और मिस्र के देवी-देवताओं का भारतीय विचारों और गणेश की कल्पना पर कोई असर पड़ा था या नहीं."
आठवीं सदी में शंकराचार्य के समय हिंदू धर्म में कई बदलाव हुए
इस दौरान शिव, शक्ति, वैष्णव, सूर्य और गणेश से जुड़े पांच संप्रदायों का असर दिखाई देने लगा.
10वीं सदी के बाद गणपति को मुख्य देव मानने वाले गणपत्य संप्रदाय का प्रसार बढ़ा.
कुरुश दलाल बताते हैं कि ख़ासकर पश्चिमी और दक्षिण भारत में गणपति के मंदिर बनने लगे. इसके साथ ही इस देवता का रूप भी बदलता गया.
वह कहते हैं, "गणपति सात्विक भी हो गए. महाराष्ट्र में वह पेशवाओं और ब्राह्मणों के प्रमुख देवता बने. शिव और पार्वती के पुत्र गणपति शाकाहारी भी हो गए."
गणपति और संस्कृतियों का मेल
बौद्ध धर्म के कुछ संप्रदायों में भी विनायक का ज़िक्र मिलता है.
ख़ासकर तिब्बत के वज्रयान बौद्ध संप्रदाय में विनायक को मुश्किलें पैदा करने वाला माना गया है.
ऐसी कहानियां भी मिलती हैं, जिनमें बोधिसत्व अवलोकितेश्वर ने विनायक पर जीत हासिल की.
बौद्ध धर्म के साथ यह देवता पूर्वी देशों तक पहुंचा. यहां तक कि जापान में भी गणपति की पूजा होने लगी.
गणेश के रूप में अलग-अलग संस्कृतियों का यह मेल जानकारों को बहुत महत्वपूर्ण लगता है.
इस बारे में हमने इतिहास के जानकार आनंद कानिटकर से बात की.
कानिटकर प्रदाय हेरिटेज मैनेजमेंट सर्विसेज़ के निदेशक हैं. उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के बामियान और हेरात में यूनेस्को की परियोजनाओं पर भी काम किया है.
वह कहते हैं, "भारत के इतिहास को देखते समय हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि उस समय आज जैसी सीमाएं नहीं थीं."
"मगध से गांधार के तक्षशिला तक का इलाक़ा पहले से व्यापारिक रास्तों के ज़रिए जुड़ा हुआ था."
"गांधार से उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ तक का इलाक़ा भी व्यापारिक रास्तों से जुड़ा था."
"कई बार ये सभी इलाक़े एक ही शासन के अंदर भी रहे. इसलिए वहां भारतीय संस्कृति के निशान मिलना कोई हैरानी की बात नहीं है."
कानिटकर इस तरफ़ भी ध्यान दिलाते हैं कि बल्ख़ से पाटलिपुत्र तक शासन करने वाले कुषाण राजाओं के सिक्कों पर ईरानी, भारतीय और यूनानी देवी-देवताओं की तस्वीरें मिलती हैं.
वह कहते हैं, "प्राचीन इतिहास को देखने पर पता चलता है कि कोई भी चीज़ पूरी तरह अलग-अलग और बंद हिस्सों में नहीं बंटी थी."
"अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिम से आने वाली ईरानी संस्कृति, स्थानीय यूनानी राजाओं की यूनानी संस्कृति, उत्तर से आने वाली मध्य एशियाई संस्कृति और दक्षिण-पूर्व से आने वाली भारतीय संस्कृति आपस में मिलीं."
"इसी वजह से गार्देज़ की इस गणेश मूर्ति पर यूनानी और ईरानी कला का असर दिखाई देता है."
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