अमेरिका से बातचीत को लेकर इतने सख़्त क्यों लग रहे हैं ईरानी अधिकारी?

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- Author, मसूद आज़र
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 13 मिनट
ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, "हमें रियायतें बातचीत से नहीं, बल्कि मिसाइलों से मिलती हैं. बातचीत में हम केवल उन्हें समझाते हैं."
आजकल ऐसा लगता है कि ईरानी अधिकारियों के बयानों में कूटनीति और 'बातचीत' की तुलना में युद्ध और धमकियों की भाषा अधिक हावी हो गई है.
राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों के बयानों की पड़ताल से पता चलता है कि वे सैन्य और टकराव के विकल्पों पर अधिक ज़ोर दे रहे हैं.
आईआरजीसी के पूर्व कमांडर और कमांडर-इन-चीफ़ के सैन्य सलाहकार मोहसेन रेज़ाई ने भी बार-बार ईरान की ओर से पहले जैसी कार्रवाई की संभावना का ज़िक्र किया है और ग़ालिबाफ़ की तरह ही लिखा है, "हम नौसैनिक नाकेबंदी को या तो बातचीत के ज़रिये से या सीधे कार्रवाई के ज़रिये तोड़ेंगे."
युद्ध और युद्धविराम के साथ-साथ 'बातचीत' शब्द भी मीडिया और सोशल नेटवर्क में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से एक बन गया है.
यह शब्द इतना दोहराया गया है कि जनता के एक हिस्से की राय में यह ईरान और पश्चिम के बीच हुई कई दौर की बातचीत की याद दिलाता है, जिन्हें आलोचकों ने निरर्थक और व्यर्थ बताया है.
बातचीत में सहमति से ज़्यादा मतभेद
जब सईद जलीली राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के कार्यकाल में ईरान के मुख्य परमाणु वार्ताकार थे, तब ईरानी अधिकारी अक्सर बातचीत में प्रगति की बात करते थे. लेकिन यह प्रक्रिया कभी रुक जाती थी तो कभी गतिरोध की स्थिति में पहुँच जाती थी.
अब, दो दशकों से अधिक की बातचीत और पिछले एक साल में हुए दो सैन्य संघर्षों के बाद, युद्ध और वार्ता की चर्चा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है.
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स्थिति इतनी गंभीर है कि किसी दिन समझौते और बातचीत की फिर से शुरुआत की अटकलें लगाई जाती हैं, और कुछ ही घंटों बाद, दोनों पक्ष युद्धविराम उल्लंघन, सैन्य तैयारियों और फिर से जंग छिड़ने की आशंका जताने लगते हैं.
ऐसा लगता है कि बातचीत से जुड़ी बार-बार आने वाली ख़बरों के प्रति बाज़ार अब कम संवेदनशील हो गए हैं.
हालांकि डोनाल्ड ट्रंप समेत वरिष्ठ अधिकारियों के बयान तेल, मुद्रा और सोने के बाज़ारों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन 'समझौते के क़रीब', 'विवरणों पर मतभेद', 'बातचीत में प्रगति', 'अंतिम निष्कर्ष' या 'बातचीत के विफल होने की आशंका' जैसी ख़बरों का प्रभाव अब उतना नहीं रह गया है.
हालांकि, अप्रत्याशित घटनाक्रम या वरिष्ठ अधिकारियों के महत्वपूर्ण बयान अब भी बाज़ार में काफ़ी उतार-चढ़ाव ला सकते हैं.
8 अप्रैल को हुए दो सप्ताह के युद्धविराम के बाद से, बार-बार उतार-चढ़ाव आए हैं. लेकिन शायद बातचीत से भी अधिक महत्वपूर्ण बयानों में अंतराल और उन पर मतभेद हैं. यानी अंतिम निर्णय कौन लेगा, बातचीत का वास्तविक लक्ष्य क्या है और ईरान कितना समझौता करने या स्थिति बदलने के लिए तैयार होगा.
बातचीत और 'पूरी तरह नुक़सान'

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हाल के हफ़्तों में ईरानी मीडिया और सोशल मीडिया में जो कुछ हो रहा है वह कुछ पर्यवेक्षकों की नज़र में 'ज़ुबानी जंग' का एक उदाहरण है.
ईरानी सरकार के क़रीबी मीडिया आउटलेट्स और कुछ अधिकारियों ने ज़ोर दिया है कि तेहरान समझौते की स्थिति में नहीं है, लेकिन बातचीत में अपनी शर्तों को सामने रखने की स्थिति में है.
29 मई को, संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अज़ीज़ी ने एक्स पर लिखा, "ट्रंप को यह पता होना चाहिए कि ईरान, मैदान में विजेता और जीतने वाले के तौर पर शर्तें तय करता है. नकद के बदले नकद, क्रेडिट के बदले क्रेडिट और कुछ नहीं के बदले कुछ नहीं."
बातचीत के बारे में कहानी का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा 'नेतृत्व की शर्तों' और मोजतबा ख़ामेनेई की ओर से निर्धारित रेड लाइन्स के पालन से संबंधित है.
इसलिए रूढ़िवादी मीडिया में प्रतिक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इस बात पर ज़ोर देता है कि बातचीत में किसी भी संभावित लचीलेपन या रियायतों को 'शुद्ध नुक़सान' या 'रेड लाइन्स को पार करना' शीर्षकों के तहत आलोचना का सामना करना पड़ सकता है.
संसद के एक रूढ़िवादी सदस्य और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के उपाध्यक्ष महमूद नबावियन इस संबंध में सबसे मुखर व्यक्तियों में से एक रहे हैं.
हालांकि बातचीत की सामग्री आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं की गई है.

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लेकिन उन्होंने 26 मई को बातचीत की प्रक्रिया के बारे में कुछ रिपोर्टों के जवाब में लिखा, "यह समझौता 'पूरी तरह नुक़सान का है' और संभावित समझौता ईरान के राष्ट्रीय हितों के विपरीत है क्योंकि इसमें प्रतिबंधों को हटाने में अस्पष्टता, मुआवज़े का निर्धारण न होना, शांतिपूर्ण परमाणु उपयोग की शर्तें और नेतृत्व की शर्तों का उल्लंघन है''.
कुछ मीडिया आउटलेट्स में मोजतबा ख़ामेनेई से जुड़ी शर्तों की सूची प्रकाशित करने के बाद ये संवेदनशीलताएँ और बढ़ गईं.
इन रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने उन सामान्य शर्तों का उल्लेख किया जो ईरानी शासन अमेरिका के साथ किसी भी समझौते के लिए चाहता है और यह भी कहा कि बातचीत इन्हीं शर्तों के अनुसार आगे बढ़नी चाहिए.
इन शर्तों में 'यूरेनियम संवर्धन को स्वीकार किया जाना', 'प्राथमिक और दूसरे दर्जे के प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना', 'क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी', 'ईरान को हर्जाने का भुगतान' और 'लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ लड़ाई सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की समाप्ति' शामिल हैं.
10 अप्रैल को इस्लामाबाद में मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के नेतृत्व में ईरानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा और बातचीत के बाद, रेज़िस्टेंस फ्रंट के क़रीबी कुछ सांसदों और मीडिया ने दावा किया कि अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ बैठक में निर्धारित 'रेड लाइन्स' का उल्लंघन करते हुए परमाणु मुद्दे को भी संबोधित किया गया था.
तब से, कुछ ईरानी मीडिया और राजनीतिक हलकों में बातचीत करने वाली टीम और मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ जैसे लोगों की आलोचना बढ़ गई है.
9 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनने के बाद से बातचीत में कई उतार-चढ़ाव आए हैं.
लेकिन शायद बातचीत से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण इसके बारे में अलग-अलग विचार और दृष्टिकोण हैं कि अंतिम निर्णय कौन लेगा, बातचीत का वास्तविक लक्ष्य क्या है, और ईरान कितना समझौता करने या अपने रुख़ में कितना बदलाव लाने को तैयार होगा.
बातचीत, मीडिया और जनमत

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सरकार के क़रीबी मीडिया संस्थानों की कवरेज की समीक्षा से पता चलता है कि इन संस्थानों ने बड़े पैमाने पर वार्ता प्रक्रिया का समर्थन किया है और ईरान के आधिकारिक रुख़ के हिसाब से ही ख़बरें पेश की हैं.
दूसरी ओर, वार्ता प्रक्रिया का विरोध भी मुख्य रूप से मोजतबा ख़ामेनेई से जुड़ी शर्तों और 'वर्चस्व की व्यवस्था को अस्वीकार करना' जैसी अवधारणाओं के दायरे में ही केंद्रित रहा है और अमेरिका के साथ संबंधों को सामान्य बनाने या सुधारने पर कम ध्यान दिया गया है.
इसलिए हाल के हफ़्तों में मीडिया ने शुक्रवार, 29 मई को मोजतबा खामेनेई के नाम से जारी एक नए संदेश के साथ ही सरकारी अधिकारियों का हवाला देते हुए बार-बार 'बेतुके राजनीतिक मतभेदों', 'दो ध्रुव (नेतृत्व) पैदा करने', 'विभाजन किए जाने' और 'राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर करने' के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है.
इन विचारों के साथ-साथ आंतरिक एकता बनाए रखने पर बढ़ते ज़ोर ने अमेरिका के साथ बातचीत के बारे में सार्वजनिक चर्चाओं के दायरे को प्रभावित किया है.
ऐसे हालात में ईरान के मीडिया में तनाव जारी रहने या बातचीत के रास्ते पर अलग-अलग विचारों की छाया अधिक सीमित दिखाई देती है.
मीडिया और राजनीतिक स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों के कारण जनमत का आकलन करना भी कठिन हो गया है. इसके नतीजे में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत करने, समझौता करने या विवादों को सुलझाने के लिए जनता की तत्परता पर स्वतंत्र और सत्यापित आंकड़े काफ़ी सीमित हैं.
प्रकाशित सर्वेक्षणों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकार के क़रीबी संस्थानों ने दिया है, और कई मामलों में सर्वे में शामिल लोगों की संख्या, नमूना इकट्ठा करने की प्रक्रिया और रिसर्च के तरीकों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रकाशित नहीं की गई है.
इन सर्वेक्षणों का ताज़ा नमूना 26 जून को 'इस्लामिक क्रांति यूनिवर्सिटी के अध्ययन और अनुसंधान संस्थान' ने प्रकाशित किया था.
कथित तौर पर इसी वर्ष मई में किए गए इस सर्वेक्षण में 48 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका के साथ बातचीत का विरोध किया, 36 प्रतिशत ने इसका समर्थन किया और 12 प्रतिशत लोगों ने कोई स्पष्ट राय ज़ाहिर नहीं की.
प्रकाशित नतीजों के अनुसार बातचीत का विरोध करने वालों का अनुपात समर्थन करने वालों से अधिक था.
कुछ सप्ताह पहले ईरानी ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन के ओफोग चैनल ने एक टेलीविज़न कार्यक्रम में घोषणा की कि '87 प्रतिशत ईरानी युद्ध जारी रखना चाहते हैं.'
हालांकि कार्यक्रम के होस्ट ने यह नहीं बताया कि सर्वेक्षण किस संगठन ने किया था या इसे जानने की प्रक्रिया क्या थी. इस दावे पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आईं, जिनमें से कुछ यूज़र्स ने अलग-अलग व्याख्याएं कीं.

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26 मई को ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए ने मजलिस रिसर्च सेंटर के एक सर्वेक्षण के नतीजे प्रकाशित किए.
इसके अनुसार 67 प्रतिशत से अधिक लोगों ने ईरान को उस समय तक युद्ध का 'विजेता पक्ष' माना. इसके विपरीत, 1.6 प्रतिशत ने अमेरिका और इसराइल को विजयी माना, और 26 प्रतिशत ने कहा कि अभी तक किसी भी पक्ष को जीत नहीं मिली है.
कुछ अन्य आधिकारिक सर्वेक्षणों की तरह आईआरएनए की रिपोर्ट में सर्वे में शामिल लोगों की तादाद और नमूना इकट्ठा करने के विवरणों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रकाशित नहीं की गई थी.
इसमें केवल यह ज़िक्र किया गया था कि सर्वेक्षण टेलीफोन के माध्यम से और राष्ट्रव्यापी स्तर पर आयोजित किया गया था.
जनमत सर्वेक्षण के आंकड़ों की अस्पष्टता और स्वतंत्र आंकड़ों की सीमित उपलब्धता के कारण अमेरिका के साथ बातचीत के मुद्दे पर जनमत का आकलन करना और भी कठिन हो गया है.
ईरान-अमेरिका संबंधों जैसे मामले में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो वर्षों से ईरान के सबसे संवेदनशील घरेलू और विदेश नीति के मुद्दों में से एक रहा है.
हालांकि, इस सीमित दायरे में भी ईरानी समाचार पत्रों में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. प्रकाशित सामग्री की समीक्षा से पता चलता है कि ईरान की राजनीतिक संरचना के भीतर बातचीत को आगे बढ़ाने के तरीके पर कोई पूर्ण सहमति नहीं है.
4 जून को ईरान के सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्रों ने अपनी मुख्य सुर्खियाँ बातचीत और समझौते की संभावना को समर्पित कीं, लेकिन इस मुद्दे पर उनके दृष्टिकोण में काफ़ी अंतर था.
कट्टरपंथी विचारधाराओं के क़रीबी अख़बारों कायहान और असर ईरानी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'केवल वही समझौता स्वीकार्य है जो ईरान के नेता की शर्तों को पूरा करता हो'.
इन अख़बारों के लेखों और सुर्खियों में भी इस ढांचे से बाहर किसी भी प्रकार के लचीलेपन से बचने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया.
इसके विपरीत, साज़ंदेगी अख़बार ने मसूद पेज़ेश्कियान के हवाले से कहा, "अमेरिका के साथ बातचीत से संबंधित फ़ैसले नेतृत्व की अनुमति से लिए जाते हैं."
अख़बार ने उनके हवाले से यह भी कहा कि ईरान 'क्षेत्र में युद्ध समाप्त करने के लिए एक सम्मानजनक ढांचा तैयार करने के लिए तैयार है.'
'समझौते की ओर एक कदम' शीर्षक वाले शारक अख़बार ने समझौते तक पहुंचने की संभावना पर ज़ोर दिया, जबकि 'संभावित समझ के बारे में बयानों का आदान-प्रदान' शीर्षक वाले कुद्स अख़बार ने वार्ता प्रक्रिया के बारे में विरोधाभासी कहानियों और रिपोर्टों की बहुलता को संबोधित किया.
कुल मिलाकर, ईरानी मीडिया कवरेज की समीक्षा से पता चलता है कि बातचीत से संबंधित चर्चाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'विजय,' 'वापसी,' और 'स्वीकार करने लायक समझौते' को परिभाषित करने पर केंद्रित रहा है.
साथ ही, मीडिया कवरेज और सार्वजनिक बयानों में बातचीत के पक्षधरों की आवाज़ें विपक्षियों की तुलना में अधिक सतर्क और दबी हुई दिखाई देती हैं.
नेतृत्व की सभी सीमा रेखाएं

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राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों के साथ ही संसद सदस्यों के बयानों की समीक्षा से पता चलता है कि निरंतर बातचीत के सिद्धांत का कोई व्यापक जनविरोध नहीं है.
फिर भी सत्ता संरचना में कई धाराएं बातचीत को 'सुलह' के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ लगातार बने टकराव के रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रही हैं.
ईरान के आधिकारिक बयान में बातचीत की व्याख्या एक प्रकार के 'राजनीतिक युद्ध' के रूप में की गई है, जिसमें ईरान को समझौते की 'ज़रूरत नहीं है' के रूप में प्रस्तुत किया गया है. इसमें ईरान के अधिकारी 'ताक़तवर स्थिति' के आधार पर बातचीत करने पर ज़ोर देते हैं.
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के सदस्य अलाएद्दीन बोरौज़ेर्दी ने कहा कि 'हर युद्ध का अंत बातचीत से होता है,' और उन्होंने बातचीत को उस लड़ाई का हिस्सा बताने की कोशिश की.
उन्होंने कहा कि मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ और विदेश मंत्री 'राजनीतिक युद्ध में लगे हुए हैं', वे जनता और सशस्त्र बलों के समर्थन से बातचीत कर रहे हैं.
ये बयान इस दृष्टिकोण को दर्शाते हैं कि बातचीत अमेरिका के साथ राजनयिक माध्यमों से टकराव को जारी रखने का एक प्रयास है.
वहीं दूसरी ओर, कट्टरपंथी विचारधाराओं से जुड़े प्रतिनिधियों और हस्तियों का एक अन्य समूह वार्ता प्रक्रिया को लेकर संशय में है और अपने बयानों में अमेरिका की अविश्वसनीयता पर ज़ोर देता है.
युद्धविराम और राजनयिक आदान-प्रदान का ज़िक्र करते हुए सांसद इस्माइल कौसारी ने कहा कि ईरान बातचीत को लेकर 'निराशावादी' है और यह मान लेना उचित नहीं होगा कि ये बातचीत निश्चित रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुँचेगी.
उन्होंने '12 दिनों के युद्ध' और हाल के संघर्षों का ज़िक्र करते हुए तर्क दिया कि अमेरिका ने बातचीत के दौरान दबाव और टकराव की अपनी नीति जारी रखी है.
ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप सचिव अली बाग़ेरी के बयानों में भी यही दृष्टिकोण देखने को मिलता है.
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि 'अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता' और उसकी नीतियों की आदतों को 'प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन' पर आधारित बताया है.
अपने बयानों में अली बाग़ेरी ने क्षेत्रीय सुरक्षा और होर्मुज़ स्ट्रेट का मुद्दा भी उठाया और चेतावनी दी कि ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किसी भी ख़तरे के ख़िलाफ़ होर्मुज़ स्ट्रेट पर पूर्ण संप्रभुता का प्रयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखता है.

ईरान के कई अन्य अधिकारियों की तरह, अपने बयानों में उन्होंने होर्मुज़ स्ट्रेट को ईरान के लिए दबाव के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया है. इस दृष्टिकोण से, यह जलमार्ग ईरान की सुरक्षा और हितों को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
संसद के कुछ सदस्य अधिक कड़ा रुख़ अपना रहे हैं. संभावित समझौते को 'जेसीपीओ से भी बदतर' बताने वालों में संसद सदस्य अबोलफ़ज़ल अबुतोराबी भी शामिल हैं.
उन्होंने दावा किया है कि परमाणु मुद्दे से लेकर होर्मुज़ स्ट्रेट और लेबनान तक, 'नेतृत्व की सभी निर्धारित सीमाओं' का उल्लंघन किया गया है. उन्होंने बातचीत को एक ऐसा समझौता भी बताया जिसमें ईरान रणनीतिक रियायतें तो देता है लेकिन उसे कोई विश्वसनीय गारंटी नहीं मिलती.
इस बीच, कट्टरपंथी आंदोलन से जुड़ी कुछ राजनीतिक हस्तियों ने भी समाज में ध्रुवीकरण से बचने पर ज़ोर दिया है. मोहम्मद रजा बहोनार ने चेतावनी दी है कि समाज को दो गुटों में नहीं बाँटना चाहिए: एक गुट बातचीत के पक्ष में है और दूसरा इसके विरोध में. ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब ईरान के राजनीतिक माहौल में वार्ता को लेकर बहस जारी है.
हालांकि, सरकार के क़रीबी हलकों से उठाई गई आलोचनाएं वार्ता प्रक्रिया पर भिन्न-भिन्न विचारों का संकेत हो सकती हैं.
टेलीग्राम चैनल 'गाह-नवेश्त'' ने 'शासन में अस्पष्टता और विरोधाभास' शीर्षक से एक विश्लेषण में लिखा है कि ईरान की सत्ता संरचना ने विरोधाभासी संदेशों से समाज और यहां तक कि विदेशी पक्षों को भी भ्रमित कर दिया है.
विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि अंततः अंतिम निर्णय कौन लेता है और क्या वार्ताकारों को सरकार का पूर्ण समर्थन प्राप्त है.
इस विश्लेषण में, निर्वाचित और नियुक्त संस्थानों के बीच की खाई, चरमपंथी समूहों का दबाव, प्रमुख निर्णय लेने की प्रक्रिया से संसद का बहिष्कार और यहां तक कि लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहना, निर्णय लेने की प्रक्रिया में संकट के संकेत के रूप में वर्णित हैं.
इन सभी दृष्टिकोणों से यह स्पष्ट होता है कि कम से कम सार्वजनिक बयानों के स्तर पर, ईरान में मुख्य मतभेद बातचीत के सिद्धांत को लेकर नहीं, बल्कि 'स्वीकार करने लायक समझौते' की परिभाषा को लेकर है.
कट्टरपंथियों के दृष्टिकोण से, समझौता पीछे हटने का संकेत नहीं होना चाहिए, जबकि अधिक उदारवादी समूहों के दृष्टिकोण से, 'बातचीत' देश में आर्थिक और सुरक्षा के और अधिक पतन को रोकने के सबसे महत्वपूर्ण तरीकों में से एक है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



























