पाकिस्तान में सुर्खियां क्यों बटोर रही है ये महिला पुलिस ऑफ़िसर

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- Author, मोहम्मद ज़ुबैर
- पदनाम, पत्रकार, कराची से बीबीसी के लिए
- प्रकाशित
बीते दिनों पाकिस्तान के लाहौर हाई कोर्ट के परिसर में हुए इस वाक़ये पर गौर करिए.
एक महिला के रेप और ब्लैकमेलिंग का अभियुक्त ज़मानत रद्द किए जाने के बाद अदालत के कमरे से फ़रार होने के लिए दौड़ लगा देता है.
मुल्ज़िम के पीछे महिला पुलिस अधिकारी ने दौड़ लगा दी. इससे पहले कि जवान मुल्ज़िम दूसरी मंज़िल की सीढ़ियां उतर कर ग़ायब होता, उससे पहले ही अधिकारी ने उसे दबोच लिया
मुल्ज़िम ने छूटने की पूरी कोशिश की. पुलिस अधिकारी को चोट भी लगी मगर उसने मुल्ज़िम के हाथ कमर की तरफ़ मोड़ दिए और वहां मौजूद लोगों में से एक से चादर लेकर हाथों को मज़बूती से बांध दिया
अदालत परिसर में कई लोग ये देखकर दंग रह गए.
सिब्तैन शाह ने यह घटना अपनी आंखों के सामने देखी तो उन्हें भी यही लग रहा था कि मुल्ज़िम महिला पुलिस अफ़सर की पकड़ से भाग जाएगा.
वे कहते हैं, "वैसे भी एक महिला के लिए एक युवा मर्द को क़ाबू में रखना मुश्किल होता है मगर हैरत है कि महिला अफ़सर ने मुल्ज़िम को अपनी पकड़ से निकलने न दिया."
एक और चश्मदीद गवाह सुल्तान महमूद कहते हैं कि बेहद बहादुर महिला अफ़सर ने अकेले दम पर मुल्ज़िम को पहले दीवार के साथ धक्का देखकर दबोचा और फिर उसके हाथ कसकर बांधकर अदालत से बाहर भी लेकर गईं.
"उसको चोट भी लगी मगर उसने परवाह न की. ऊपरी तौर पर यह अविश्वसनीय लगता है मगर यह सब हमारी आंखों के सामने हुआ."

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कौन है यह बहादुर महिला ऑफ़िसर ?
सोशल मीडिया पर भी इस महिला अफ़सर की हिम्मत की ख़ूब तारीफ़ हुई है.
राना बिलाल ने लिखा, "पुलिस के आला अफ़सरों को ऐसी बहादुर बेटियों का हौसला बढ़ाना चाहिए"
जबकि सादिया कहती हैं, "हमारी ताक़त का अंदाज़ा है ही नहीं किसी को."
यह ज़िला हाफ़िज़ाबाद की सब इंस्पेक्टर महविश असलम हैं जो इस समय अनुसंधान विभाग में सेवाएं दे रही हैं.
वह अपने ज़िले की पहली महिला पुलिस अफ़सरों में शामिल हैं.
उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए बताया कि उस आदमी पर एक महिला के रेप और ब्लैकमेलिंग का आरोप है.
महविश ने कहा, "मैं लंबे अरसे से उसका पीछा कर रही थी. अगर वह अब फ़रार हो जाता तो शायद उसको जल्द पकड़ना मुमकिन न होता. इसलिए मैंने कुछ सोचे समझे बिना पल भर में फ़ैसला किया कि उसको हर स्थिति में पकड़ना है चाहे कुछ भी हो जाए."
इस व्यक्ति के ख़िलाफ़ रेप का एक मुक़दमा जुलाई में दर्ज हुआ था.
महविश असलम का कहना था, "मुल्ज़िमों ने न सिर्फ़ रेप किया बल्कि उस महिला की वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने की भी कोशिश की थी. "

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वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
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उनका कहना था, "मुझे लगा कि अगर यह लाहौर हाई कोर्ट से फ़रार हो जाता तो फिर यह दोबारा कोई न कोई चक्कर चलाता और अपनी पहुंच-पैरवी इस्तेमाल करता. वैसे भी ऐसे मुल्ज़िम किसी रियायत के लायक नहीं होते. उनको हर हाल में अदालत का सामना करना चाहिए."
मगर महविश ने अकेले उस मुल्ज़िम को कैसे क़ाबू किया?
इस सवाल पर वह बताती हैं, "ऊपर से देखने से मुल्ज़िम मुझसे ताक़तवर लगता है मगर मैं जानती हूं कि मेरे साथ सच की ताक़त थी और मेरे पास ऐसा जज़्बा था कि मैंने मुल्ज़िम को फ़रार नहीं होने दिया."
महिला अफ़सर बताती हैं, "हमें अतीत में ऐसा सुनने को मिला है कि मुल्ज़िम अदालत के अहाते में ही पुलिस से ख़ुद को छुड़ा कर भाग गया और अब पुलिस को उसकी दोबारा तलाश है."
पंजाब पुलिस के प्रवक्ता वक़ास नज़ीर ने बताया, "फ़ोर्स अपने किसी भी अफ़सर चाहे वह मर्द हो या औरत, इसी तरह के जज़्बे की उम्मीद करती है…पंजाब पुलिस उनकी बहादुरी का सम्मान करती है."
वह कहते हैं कि पुलिस अफसरों से उम्मीद की जाती है कि वह "किसी भी मौक़े पर और किसी भी हालत में अपनी ट्रेनिंग को काम में लाते हुए मुल्ज़िमों को फ़रार न होने दें."
महविश असलम कहती हैं कि हमें ट्रेनिंग के दौरान मुल्ज़िमों से निपटने, उन्हें पकड़ने और छापे मारने की ट्रेनिंग दी जाती है. उनके अनुसार वह अनुसंधान विभाग में काम करती हैं, इसलिए उन्हें अकेले भी इस मुल्ज़िम से डर नहीं लगा.
"पहली बार वर्दी पहनी तो पिता की आंखों में आंसू आ गए"

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महविश असलम का संबंध हाफ़िज़ाबाद के इलाक़े पिंडी भट्टियां से है. उनके पिता एक किसान हैं और वह तीन बहनें और एक भाई हैं.
वह बताती हैं, "हमारे पिता ने शुरू से ही हम बहनों की पढ़ाई-लिखाई को हर काम से अधिक महत्व दिया. हमारे इलाक़े और ख़ानदान में हम पहली तीन बहनें हैं जो कॉलेज और यूनिवर्सिटी गयी हैं."
वह कहती हैं, "पिता अपने काम छोड़कर हमें इंटरव्यूज़ और इम्तिहानों के लिए लेकर जाते थे. लोग कहते कि ऐसा कभी नहीं देखा कि कोई इस तरह अपनी बेटियों को पढ़ा रहा है, ताना भी मारते तो वालिद कहते थे कि बेटा न भी पढ़ा तो कोई बात नहीं. वह मज़दूरी या कारोबार कर लेगा. बेटियों को ज़रूर पढ़ाऊंगा क्योंकि यह सबसे बेहतरीन दहेज है."
महविश ने पुलिस फोर्स 2015 में बतौर सब-इंस्पेक्टर ज्वाइन की.
"हमारे पूरे ज़िले और इलाक़े में मुझसे पहले कोई भी महिला पुलिस अफ़सर नहीं थी. मेरी मां एक घरेलू महिला हैं, जब मैंने पहली बार वर्दी पहनी तो उन्होंने कहा कि पहले मुझे वर्दी से डर लगता था."
उनका कहना था कि पुलिस फ़ोर्स में उन्हें किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा बल्कि हर समय हौसला बढ़ाया गया.
"मैं पिछले तीन वर्षों से पुलिस में हूँ. इस दौरान मैंने दिल तोड़ देने वाले केसों की तफ़्तीश की है. मुझे लगता है कि महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों में शायद इज़ाफ़ा हो रहा है."
महविश कहती हैं कि मां-बाप को अपने बेटियों को का ख़ास ख़्याल रखना चाहिए और उन्हें पढ़ाने, करियर बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















