उस्ताद अमजद अली ख़ान का सरोद सफ़र: ग्वालियर से दुनिया के मंच तक

उस्ताद अमजद अली ख़ान का सरोद सफ़र: ग्वालियर से दुनिया के मंच तक
    • Author, इरफ़ान
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
  • प्रकाशित

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अमजद अली ख़ान एक ऐसा नाम है, जो सरोद के तारों से निकलने वाली हर धुन में जीवंत हो उठता है.

उस्ताद अमजद अली ख़ान ना सिर्फ़ एक संगीतकार हैं, बल्कि एक ऐसी शख़्सियत हैं, जिन्होंने अपनी कला से दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया है.

अमजद अली ख़ान का 9 अक्तूबर 1945 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्म हुआ था. उनका परिवार पुश्त-दर-पुश्त सरोद बजाता आ रहा है.

आज अमजद अली ख़ान के पोते अगर ये कहें कि हम तो आठ पुश्तों से सरोद ही बजा रहे हैं तो कोई हैरत नहीं होगी क्योंकि अमजद अली ख़ान छठवीं पीढ़ी के सरोद वादक हैं.

उनके पुरखे सेनिया-बंगश घराने की बंगश परंपरा के बड़े ही नामचीन संगीतकार हुए हैं, जिन्होंने मध्य एशिया के पारंपरिक वाद्य रबाब को तराशते-संवारते हुए सरोद की शक्ल दी है.

हम अमजद अली ख़ान के हाथों में आज जो सरोद देखते हैं, उसके तार सदियों पीछे मध्य एशिया के लोकवाद्य रबाब से जुड़े हुए हैं.

बताते हैं कि इस रबाब को भारत लाने का श्रेय अमजद अली ख़ान के पुरखों में से एक मोहम्मद हाशमी ख़ान बंगश को जाता है.

हमेशा साथ रहता था रबाब

अफ़ग़ानिस्तान का एक बंगश पठान मोहम्मद हाशमी ख़ान बंगश घोड़ों का सौदागर था. वह अक्सर घोड़ों की ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त के सिलसिले में हिन्दुस्तान आया जाया करता था.

सफ़र की थकान और मन बहलाने के लिए उसका रबाब हमेशा उसके साथ रहता था, जिस पर वह रेतीले मैदानों और घाटियों में अपने आराम की घड़ियां कई मधुर धुनें छेड़ता हुआ गुज़ारा करता.

ये मधुर धुनें उसे वतन से दूर छूट गए वतन में वापस ले जातीं और एक नए वतन की फ़िज़ा में सुकून का एहसास दिलातीं.

बरसों के इस सिलसिले को तब एक विराम मिला जब आख़िरकार उसने मध्य भारत के रीवा राज में बसने का फ़ैसला कर लिया.

बात कोई 18वीं सदी के मध्य की है. रीवा की रियासत में शास्त्रीय संगीत का बहुत बोलबाला था और यहां हाशमी ख़ान ने अपने लोकसंगीत की धुनों को शास्त्रीय संगीत की धुनों के साथ एक रिश्ते में बंधते हुए देखा.

उसने अपने बेटे ग़ुलाम बंदगी ख़ान में इस शास्त्रीय संगीत की तरफ़ दिलचस्पी पैदा की.

ग़ुलाम बंदगी ख़ान ने बड़े ही ग़ौर-ओ-फ़िक़्र के बाद पाया कि इस लोकवाद्य रबाब के तारों से निकलने वाली आवाज़ बहुत जल्दी खो जाती है. वहीं भारतीय शास्त्रीय संगीत में काम आने वाले दूसरे साज़ों में एक स्वर से दूसरे स्वर तक आने-जाने में साज़ की आवाज़ ठहरी रहती है, इनमें गहराई है और सबसे बड़ी चीज़ है उनका स्वर माधुर्य.

ग़ुलाम बंदगी ख़ान ने बरसों की खोजबीन और मेहनत के बाद अपने रबाब में बदलाव करने शुरू किए. उन्होंने मिठास की तलाश में अपने नए साज़ के सीने में धातु का इस्तेमाल किया और तांत की जगह धातु के तार लगाए.

सरोद नाम कैसे पड़ा?

फ़ारसी में स्वर की मधुरता को सरूद कहते हैं और जब इस साज़ ने इस मधुरता को प्रतिध्वनित किया तो इसे सरूद कहा गया, जो आगे चलकर सरोद हुआ.

गुज़रते वक़्त के साथ इस सरोद में और भी बदलाव हुए और इन सभी बदलावों की झांकी पेश करता एक 'सरोद घर' अमजद अली ख़ान के सद्प्रयासों से ग्वालियर में स्थापित किया गया है.

ख़ान साहब का संगीत के प्रति ऐसा समर्पण दुर्लभ है. ख़ुद अमजद अली ख़ान कहते हैं कि पाश्चात्य संगीत के उलट हमारे यहां जो संगीतकार होता है, वह कंपोज़र, कंडक्टर और परफ़ॉर्मर यानी 'थ्री इन वन' होता है.

अमजद अली ख़ान उन हाफ़िज़ अली ख़ान के सबसे छोटे बेटे हैं, जिन्होंने शुरू में अपने वालिद नन्हे ख़ान बंगश से शिक्षा पाई थी और बाद में 16वीं शताब्दी के बाबा-ए-मौसीक़ी तानसेन के वंशज उस्ताद मोहम्मद वज़ीर ख़ान से संगीत की शिक्षा पाई थी.

हाफ़िज़ अली ख़ान ने अपनी सरपरस्ती में नन्हे अमजद को संगीत की बारीकियां सिखाईं और 12 साल की उम्र में अमजद अली ने अपने फ़न के शुरुआती जौहर दिखाकर संगीत की दुनिया में जो क़दम रखा तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

यह लंबा सफ़र अमजद अली ख़ान की उपलब्धियों की निशानदेही करता है. हर गुज़रते दिन के साथ सरोद से उनका इश्क़ बढ़ता ही जाता है.

कई नए रागों की रचना

सरोद पर महारत हासिल करते हुए उन्होंने कई नई और कालजयी संगीत रचनाओं को जन्म दिया है. वादन की पारंपरिक शुचिता का सम्मान करते हुए वो प्रयोगों से कभी पीछे नहीं हटे और कई नए रागों की रचना की है.

तीन भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की स्मृति को समर्पित राग जवाहर मंजरी, राग प्रियदर्शनी और राग कमलश्री के अलावा महात्मा गांधी की स्मृति में रचा बापूकौंस एक अलग अहमियत रखता है.

उस्ताद अमजद अली ख़ान ने विश्व के कई प्रमुख मंचों, जैसे कार्नेगी हॉल और रॉयल फेस्टिवल हॉल में अपने प्रदर्शन से दर्शकों को रास विभोर किया है.

उस्ताद अमजद अली ख़ान के योगदान को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण शामिल हैं. इसके अलावा, उन्हें यूनेस्को अवॉर्ड और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है.

उस्ताद अमजद अली ख़ान ने ना सिर्फ़ भारत, बल्कि विश्व स्तर पर शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

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