'पुश इन से पहले बत्तियां बंद कर दी जाती हैं': बीएसएफ़ को लेकर बांग्लादेश का दावा

- Author, नगीब बहार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
"उनकी सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ के समानांतर सीमावर्ती सड़क है और उस बाड़ में विभिन्न इलाकों में गेट बनाए गए हैं. उस सड़क पर रात को बड़ी गाड़ियों में लोगों को ले जाकर बत्ती बुझा दी जाती है. उसके बाद किसी एक गेट को खोलकर वे लोगों को बांग्लादेश सीमा में धकेल देते हैं."
बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (बीजीबी) के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल महमूदुल हसन ने भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) के जवानों की ओर से सीमा के विभिन्न इलाकों से लोगों को जबरन सीमा पार बांग्लादेश भेजने के तरीके का ब्योरा देते हुए यह दावा किया.
भारत-बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में बीते कुछ दिनों से 'पुश इन' या 'पुश बैक' के मुद्दे पर तनाव बढ़ रहा है.
बीजीबी और बीएसएफ़ के बीच बार-बार फ़्लैग मीटिंग और वाद-विवाद की घटनाएं तो हो ही रही हैं, कई ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जब बांग्लादेश के लोगों ने बीएसएफ़ के जवानों का पीछा किया है.
बीते क़रीब दो सप्ताह से विभिन्न सीमावर्ती इलाकों में एक जैसी परिस्थिति बनी हुई है.
बीजीबी का दावा है कि मई की शुरुआत से जून के शुरुआती दस दिनों के दौरान बीएसएफ़ ने सीमा के 20 इलाकों में कम से कम दो सौ लोगों को बांग्लादेश की सीमा पर धकेलने की कोशिश की है.
उसका कहना है कि ऐसे तमाम मामलों में बीजीबी के जवानों के साथ स्थानीय लोगों के विरोध के कारण एक भी व्यक्ति बांग्लादेश सीमा में प्रवेश नहीं कर सका.
बीजीबी अधिकारियों का कहना है कि हर ज़िले में बीएसएफ़ के 'पुश इन' करने का पैटर्न मिलता-जुलता है.
जनरल हसन बताते हैं, "हर बार पुश इन से पहले भारतीय सीमावर्ती इलाक़े में बत्तियां बंद कर दी जाती हैं. यही इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि बीएसएफ़ 'पुश इन' करने की तैयारी में है."
उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों को इस मामले की जानकारी दी जा रही है और 'पुश इन' रोकने में मदद मांगी जा रही है.
कैसे हैं बॉर्डर से सटे इलाक़ों में हालात

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जसोर से बेनापोल इलाके में भारतीय सीमा से सटे सादीपुर गांव से एक अन्य सीमावर्ती गांव रघुनाथपुर जाने वाली सड़क भी बांग्लादेश सीमा से एकदम सटी है. इस सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हैं.
दो जून को इस सड़क पर जाने पर एक अलग तस्वीर नज़र आई. ऐसा लगा मानो यह पूरा इलाका कोई पर्यटन स्थल बन गया है.
वहां यह देखने के लिए स्थानीय लोगों की भारी भीड़ जुटी थी कि भारत से जबरन बांग्लादेश भेजे गए जो लोग 'नो मेन्स लैंड' इलाके में फंसे हैं वे कैसे रह रहे हैं.
हालांकि वहां 'नो मेंस लैंड' इलाके में उस समय एक भी व्यक्ति नज़र नहीं आया.
जून महीने की भारी गर्मी मे 36 घंटे से भी ज़्यादा समय तक 'नो मेन्स लैंड' में फंसे 10 से 12 लोगों ने उस समय शायद भारतीय सीमा पर लगे कंटीले तारों की बाड़ के पास लगे पेड़ों की छाया में शरण ले रखी थी. 'नो मेन्स लैंड' में उनके कुछ कपड़े और सामान नज़र आ रहे थे.
बीजीबी का आरोप है कि बीएसएफ़ ने 10-12 लोगों के इस समूह को बीती 31 मई की आधी रात के समय कंटीली तारों की बाड़ में बने गेट के ज़रिए जबरन बांग्लादेश सीमा में धकेल दिया था.
उस समय बीजीबी के जवानों ने टॉर्च जलाकर और लाउडस्पीकर के ज़रिए चेतावनी देकर उनको बांग्लादेश की ओर आने से रोक दिया था. इसकी वजह से वे लोग वहां नो मेंस लैंड में फंस गए.
इसके कुछ दिनों बाद सात जून को भी चंपाईनवाबगंज के गोमास्तापुर की बांगाबाड़ी के सीमावर्ती इलाके में जाने पर लगभग ऐसी ही परिस्थिति देखने को मिली. बीजीबी का आरोप है कि उस सीमा से तीन जून की रात को बीएसएफ़ ने 28 लोगों को बांग्लादेश की ओर 'पुश इन' करने का प्रयास किया था.
तीन जून की रात को करीब दो-ढाई बजे बांगाबाड़ी सीमा चौकी के बीजीबी जवानों और 20-30 स्थानीय लोगों ने उन लोगों को बांग्लादेश की ओर आने से रोक दिया.
इसके कारण वे लोग भी 'नो मेन्स लैंड' में रहने पर मजबूर हो गए. वहां वे लोग दो दिन तक रहे. लेकिन छह जून की रात से उनको 'नो मेन्स लैंड' में नहीं देखा गया है.
उस इलाके में बीजीबी के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि बीएसएफ़ के साथ कई दौर की बातचीत के बाद छह जून की रात को बत्ती बुझाने के बाद बीएसएफ़ ने वहां फंसे लोगों को भारतीय सीमा में प्रवेश करने की अनुमति दे दी थी.
हालांकि बीएसएफ़ ने इस मुद्दे पर औपचारिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है.
बीएसएफ़ पर 'पुश इन' के आरोप

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मई के आख़िर में सातखीरा ज़िले के कलारोया उपज़िला से सटी सीमा पर भारतीय इलाके में सैकड़ों लोगों के जुटने की ख़बरें सामने आने के बाद बीजीबी ने पश्चिम बंगाल से सटे तमाम इलाकों में निगरानी बढ़ा दी थी.
उसके बाद से ही बीजीबी के जवान स्थानीय लोगों के साथ मिल कर झिनाईदह, जसोर, नौगांव, चांपाईनवाबगंज और पंचगढ़ समेत विभिन्न ज़िलों में 'पुश इन' के ज़रिए आने वाले लोगों को रोकते रहे.
बीजीबी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के रीज़न कमांडर ब्रिगेडियर जनरल महमूदुल हसन बताते हैं कि ऐसे तमाम मामलों में बीएसएफ़ का 'पुश इन' का तरीका एक जैसा है.
बीजीबी की निगरानी, सामरिक और नागरिक सूत्रों के अलावा ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर उनका कहना था कि किसी सीमावर्ती इलाके़ से किसी व्यक्ति को जबरन सीमा पार भेजने से पहले बीएसएफ़ की कुछ हरकतें 'संकेत' का काम करती हैं. उनसे पता चलता है कि लोगों को सीमा पार से भेजने की तैयारी की जा रही है.
ब्रिगेडियर जनरल महमूदुल हसन का दावा है कि सीमावर्ती इलाकों में बसे बांग्लादेश के गांवों के आम लोगों की ओर से निगरानी और गश्त में बीजीबी को काफी मदद मिलती है.
उनकी मदद के बिना 'पुश इन' रोकना संभव नहीं होता.
बीजीबी को कैसे मदद कर रहे स्थानीय लोग

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मई में सातखारी के कलारोया सीमा पर भारतीय इलाके में लोगों के जुटने के बाद से ही बीजीबी ने पश्चिम बंगाल से लगी सीमा पर निगरानी और गश्त बढ़ा दी है.
इसके तहत स्थानीय लोगों को भी इस काम में शामिल किया गया.
बीजीबी के नौगांव बटालियन के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल अरिफुल इस्लाम मासूम बताते हैं, "हम स्थानीय स्कूलों, मस्जिदों और बाज़ारों में नियमित रूप से लाउडस्पीकर की मदद से लोगों को सतर्क करते रहते हैं. इसके साथ ही स्थानीय लोगों से बातचीत की जाती है. हमने उनसे कहा है कि कोई भी संकेत मिलने पर समझना होगा कि पुश इन की कोशिश हो रही है."
उनका कहना था, ''इसका नतीजा भी कुछ दिनों के भीतर ही सामने आया. बांगाबाड़ी सीमा पर तीन जून की आधी रात को भारतीय सीमा में बत्तियां बुझने और कुछ लोगों के 'पुश इन' की कोशिश के बारे में बाज़ार के एक चौकीदार ने ही हमें सूचना दी थी.''
उस चौकीदार अमीनुल्लाह का कहना था कि बीजीबी के अधिकारियों ने कुछ दिनों पहले से उसे सीमावर्ती इलाके में बत्तियां बंद होने या भारतीय सीमा में वाहनों की आवाजाही की आवाज़ मिलने पर सतर्क रहने को कहा था.
यही नहीं, सीमा से महज़ कुछ सौ मीटर ही घर होने के कारण तीन जून की रात को भारतीय सीमा से आने वाले 28 लोगों को रोकने में उनके परिवार के सदस्य ही सबसे आगे थे. उनमें कुछ महिलाएं भी थीं.
अमीनुल्लाह की बहन ने बताया, "रात को करीब ढाई बजे हमने देखा कि कुछ पुरुष और महिलाएं हमारी सीमा में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हैं. बीजीबी ने पुरुषों को तो रोक दिया था. लेकिन उसके जवान महिलाओं को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. तब हम महिलाओं ने उन महिलाओं को रोका और भारतीय सीमा की ओर धकेल दिया."
सिर्फ़ बांगाबाड़ी ही नहीं, कई और सीमावर्ती इलाकों में भी 'पुश इन' की घटनाओं को रोकने में स्थानीय लोगों की भूमिका सामने आई है.
जून की शुरुआत में लालमनीरहाट में ग्रामीणों के एक समूह की ओर से बीएसएफ़ जवानों का पीछा करने का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था.

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उनका कहना है कि विभिन्न सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय ग्रामीण रातों को जागकर बीजीबी के साथ पहरेदारी और गश्त कर रहे हैं.
बीजीबी के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि आम लोगों के गश्त नहीं करने के बावजूद कई बार भारी तादाद में उनकी मौजूदगी से ही काम हो जाता है.
भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण बीएसएफ़ आम तौर पर 'पुश इन' नहीं कर पाती.
जसोर और चांपाईनवाबगंज के सीमावर्ती इलाके में कई गांवों के लोगों से बातचीत से पता चलता है कि 'नो मेन्स लैंड' में फंसे लोगों के प्रति उनके मन में काफी सहानुभूति है.
उन लोगों में से कइयों के बांग्लादेशी नागरिक होने के कारण उनको वापस देश में प्रवेश के अनुमति देने के बारे में भी उनका नज़रिया सकारात्मक है.
लेकिन बीजीबी की तरह वो लोग भी चाहते हैं कि बांग्लादेश नागरिकों को वापस भेजने की यह प्रक्रिया 'पुश इन' या 'पुश बैक' की बजाय कानूनी तरीके से हो.
बीएसएफ़ का क्या कहना है?
बीएसएफ़ ने अब तक बीजीबी के आरोपों पर औपचारिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है.
लेकिन बीजीबी अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के बीच विभिन्न स्तर पर होने वाली बैठकों में उन्होंने (बीएसएफ़) ने कई बार 'पुश इन' के आरोपों को खारिज कर दिया है.
बीजीबी के इन आरोपों के बारे में आखिर बीएसएफ़ का क्या कहना है?
इस सवाल पर बीजीबी के रीजन कमांडर ब्रिगेडियर जनरल महमूदुल हसन कहते हैं, "बीएसएफ़ की दलील है कि 'पुश इन' की घटनाओं से उसका कोई संबंध नहीं है और उनको यह नहीं पता है कि यह लोग ज़ीरो लाइन के इस पार कैसे पहुंचे. उसका मानना है कि नो मेन्स लैंड में फंसे लोग बांग्लादेश के नागरिक हैं."
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